बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९६ ) सतसई-सटीक ।
प्यासे दुपहर जेठके, थके सबै जल शोधि।
मरु धर पायमतीरही, मारू कहति पयोधि॥६०१
दुपहरके प्यासे जेठ महीनेमें पथिक सब ओर जल ढूंढ
कर थकगये, और मारवारकी भूमिमें बड़े तरबूजको पाकर
उसको दूधका सागर कहतेहैं, यह मारवाडमें जाकर कहाथा
“ प्रहर्षणांलंकार ” ॥ ६०१ ॥
विषम वृषादिककी तृषा, जिये मतीरनि शोधि ।
अमित अपार अगाध जल, मारो मूंड पयोधि॥
कठिन वृषके सूर्य ( ज्येष्ठ महीने ) की प्यासमें जो कि,
दुःसह होती है, उसमें जो मनुष्य तरबूजको ढूंढ जल पान
करतेहैं वे कहते हैं कि, इसके सामने महा अपार गहरे जल-
वाले समुद्रको शिरसे मारो अर्थात् सागरसे हमें कुछ काम
नहीं “अन्योक्तिअलंकार” ॥ ६०२ ॥
अतिअगाध अति ऊथरो, नदी कूप सर बाय।
सो ताको सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाय॥६०३
नदी कूप सरोवर बावडीका अति गहरा या उथला पानी
हो परन्तु उसका वही सागरहै जहां जिसकी प्यास बुझजाय,
किसी पुरुषकी लग्न किसी कामिनीसे लगी. और उसकीही
गुणकथा गाई इसपर सखीने कहा “अन्योक्तिअलंकार” ६०३