बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८४ ) सतसई-सटीक ।
प्यारी ज्यों ज्यों वस्त्रको पटकती झटकती हटकती नेत्र
नचाती हँसतीहै त्यों त्यों निपट उदार प्रीतमकोभी फगुआ
देते नहीं बनता, आशय यह कि, फगुआ देनेसे फिर यह
लीला न करेगी "विशेषोक्ति" उदारता होकर भी न देना ५६३
रसभिजयेदोऊदुहुनि, तउटिकरहे टरैंन ।
छबिसों छिरकत प्रेमरँग, भरिपिचकारीनैन ५६४॥
रससे दोनोंने दोनोंको भिजोदिया, तो भी डटरहे हैं टारेसे
टलते नहीं छबिसे प्रेमका रंग छिड़कते हैं और वह प्रेमका रंग
नेत्रोंकी पिचकारीमें भरते हैं "रूपक" [रस-प्रेम, जल] ५६४
छकि रसाल सौरभ सन, मधुर माधुरी गन्ध ।
ठौर ठौर झोरत फिरत, भौंरभीर मधु अंध ५६५॥
मोरकी सुगन्धसे छकके तथा मीठी माधुरी गंधमें सनकर
मकरन्दके मद्यसे अंधीहुई भौरोंकी भीर ठौरठौर गूंजती फि-
रतीहै "जाति अलंकार" ॥ ५६५ ॥
दिशिदिशि कुसुमितदेखिये, उपवन विपिनसमाज।
मनहुवियोगनकोकियो, शरपञ्जरऋतुराज ५६६
दिशा दिशाओंमें उपवन और वनका समाज फूलाहुवा
है मानों वसन्तऋतुने वियोगियोंको बाणोंका पींजरा कियाहै,
जैसे बहेलिये पक्षियोंको पकडनेको जाल बिछाते हैं इसप्र-