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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

( १९० ) सतसई-सटीक ।
आवत जात न जानियत, तेजहि तजि सियराना।
घरहि जमाईलों धस्यो, खस्यो पूषदिनमान५८२
आते और जाते जाना नहीं जाता तेजको त्यागकर शी-
तल होगया है घरमें जमाईकी सम घुसा हुआ पूषका दिन
खसकताहै आशय यह ससुरालमें जमाईभी सकुचवश शीतल
हुआ रहताहै " पूर्णोपमा" ॥ ५८२ ॥
तपनतेज तपताप तन, तूल तुलाई माह ।
शिशिर शीत क्योंहुनघटै, बिनलपटेटियबांह५८३
सूर्यके तेजसे आगके तापनेसे रुईकी रजाईसेभी माहके
महीनेमें बिना प्यारीको भुजा भरके लपटाये शिशिरका
शीत किसी भांति नहीं घटता "परिसंख्या"[ दो०-कहूँ तो
अर्थ निषेधकर, और कहूँ ठहराय। तेहि परिसंख्या कहत हैं,
सो यहँ प्रगट लखाय] ॥ ५८३ ॥
लगतसुभगशीतलकिरण, निशदिनसुखअवगाहि
माहशशीभ्रमसूरत्यों, रहतचकोरीचाहि॥५८४ ॥
सूर्यकी किरण दिन रातके समान सुखदायक और शीत-
ल विदित होतीहै दिनमेंही यह सुख विचारकर माह महीनेमें
चकोरी सूरजको भ्रमसे चन्द्रमा जानकर देखरही है " भ्रांति
अलंकार " ॥ ५८४ ॥