बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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षटशतक ६. ( १९५ )
इनमें नहीं डूबेहैं सो तो डूबे और जो इनमें सर्वांगसे डूबे हैं
वेतेरेहैं " विरोधाभास " ॥ ५९७ ॥
सम्पति केश सुदेश नर, नवत दुहुँनि यकवानि।
विभवसतरकुचनीचनर, नरमविभवकीहानि ॥
सम्पत्तिमें केश और भले मनुष्य नवतेहैं दोनोंकी एकही
बानहै, जैसे ऐश्वर्यमें कुच और नीच नर कठोर होतेहैं ऐश्व-
र्यकी हानिमें नरम होतेहैं "दीपकमालालंकार" जहाँ उप-
मान उपमेयसे एक पद लगताहै वह दीपक माला ॥ ५९८॥
कैसे छोटे नरनसों, सरत बड़नके काम ।
मढो दमामो जातहै, कहिं चूहेके चाम ॥५९९॥
छोटे मनुष्योंसे बड़ोंके काम किसप्रकार सर सकते हैं
कहीं चूहेके चामसे (दमामा) ऊँट पर रखनेका नगाड़ा
मढ़ा जासकताहै कभी नहीं " दृष्टांत " ॥ ५९९ ॥
ओछे बड़े हुए सकें