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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

( १९२ ) सतसई-सटीक ।
परागका कणही पसीना चूताहै, प्रत्येक वृक्षके नीचे ठह-
रता हुआ थके हुए पथिकके समान वायु दक्षिणते आताहै ।
विरमाय-ठहरना "रूपकालंकार" ॥५८८॥
रहेरुके क्योंहूँ सुचलि, अधिकराति पधारि ।
हरति ताप सब द्योसको, उरलग यार बयारि ५८९
दिनभर रुकेरहे कहीं चलकर फिर आधीरातको पधारे
यार (मित्र) रूपपवनने हृदयसे लगकर सबदिनके ताप-
हरलिये हैं "छेकापह्नुति" अथवा नायकाने कहा दिनभर कहीं
रहकर रात्रिके समय हृदयसे लग ताप दूर कियाहै
(सखीने कहा) यार बालाने कही पवन ॥५८९॥
लपटी पुहुप पराग पट, सनी स्वेदमकरन्द ।
आवतनारिनवोढ़लों, सुखद वायगतिमन्द॥५९०
फूलोंके परागरूपी वस्त्र और फूलोंके रसरूपी पसीनेसे
सनी सुख देनेवाली पवन मन्दगतिसे नवोढा स्त्रीके समान
आतीहै नवोढा नई विवाहिता "रूपकालंकार" ॥५९०॥
चटक न छांडत घटतहू, सज्जन नेह गंभीर ।
फीको परै न बर घटै, रँगो चोल रँग चीर ॥५९१॥
स्नेहमें गंभीर सज्जन धन आदिसे घटतेभी चटक नहीं
छोडते बल घटनेसेभी मंजीठका रँगा कपडा फीका नहीं