बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९४ ) सतसई-सटीक ।
ज्यों ज्यों उनके माथेमें मारै त्यों २ ऊँचे होते हैं "दृष्टान्ता-
लंकार" कृपणके समान धन संग्रह करनेवालेकी नि-
न्दाहै ॥ ५९४ ॥
कोटि यतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहि बीच ।
नलबल जल ऊंचे चढै, अन्त नीचको नीच ५९५
चाहै कोई कोटि यत्न करै परन्तु स्वभावमें अन्तर नहीं
पडता देखो नलके बलसे जल ऊँचे चढ़ताहै परन्तु अन्तमें
नीचेहीको आताहै नीच प्रकृति है ( नल-फुहारेका )
"दृष्टान्तालंकार" ॥ ५९५ ॥
गढरचना वरुनीं अलक, चितवन भाहकमान ।
आव बँकाईही बढै, तरुणि तुरंगम तान ॥५९६॥
गढ़की रचना, बरौनी-पलकके बाल अलक ( जुल्फ )
चितवन भौंह कमान तरुणी ( स्त्री ) घोडा और हाथी इनकी
आव ( प्रतिष्ठा ) बांकेपनसेही बढ़ती है, अथवा तुरंगम घोडा
और तान "दीपिकालंकार" ॥ ५९६ ॥
तन्त्री नाद कवित्त रस, सरस राग रतिरंग ।
अनबूडे बूडे तरे, जे बूडे सब अंग ॥ ५९७ ॥
वीणाका शब्द, कविताईका रस, रसभरे राग रतिरंग, जो