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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 290 में से

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पृष्ठ 253

( २०० ) सतसई-सटीक ।
जिसको शिरपर धारण कर राजा और राव संसार अपनी
बडी प्रतिष्ठा प्राप्त करतेहैं, यदि मुकुटको पाँवमें पहरे तो
अपनी जडता प्रगट करतेहैं आशय यह कि, श्रेष्ठ लोक मुक-
टके समानहैं उनको जो शिर धरते अर्थात् आदर करतेहैं
वे बडाई पातेहैं, जो निरादर करतेहैं वे अपनी मूर्खता
प्रगट करते हैं “ अन्योक्तिअलंकार ” ॥ ६१४ ॥
अरे परेखो क्यों करै, तुही विलोक विचारि ।
केहि नर केहि सर राखिये, खरे बढेपर पारि ६१५
अरे अब परीक्षा कौन करै तूही विचारकर देख अच्छी
प्रकार बढते किस मनुष्य और किस सरोवरने मर्यादा रक्खी
है “ दीपकालंकार ” ॥ ६१५ ॥
बुरे बुराई जो तजैं, तौ मन खरो सकात ।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गिनैं लोग उतपात ॥
जो बुरे बुराई त्यागदें तो उनसे मन बहुत डरता है जैसे
निष्कलंक चंद्रमाको देखकर लोग उतपात मानते हैं “दृष्टा-
न्तालंकार” ॥ ६१६ ॥
भाँवरि अनभाँवरि भरो, करो कोटि बकवाद ।
अपनी अपनी भाँतिको, छुटै न सहज सवाद ६१७
रुचिमें अरुचि करो करोड़ बकवाद करो परन्तु अपनी २