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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( १७२ ) सतसई-सटीक ।
अरगटही फानूससी, परगट होत लखाय ॥५२४॥
वह बाला छबीली स्त्रियोंमें आप छिपकर बैठी परन्तु
घूँघटहीमें फानूससी प्रगट होकर दीखती है। पूर्णोपमा ५२४॥
करत मलिन आछी छविहि, हरतु जु सहजविकास
अंगराग अंगनि लज्यो, ज्यों आरसी उसास ५२५
यह तनुकी अच्छी छबिको मलीन करती है, स्वाभाविक
विकास ( चमक ) को हरण करता है, यह अंगोंमें लगा-
हुआ अंगराग ऐसा है, जैसे आरसीके स्वच्छ दर्पणपर, श्वा-
सकी भाप । पूर्णोपमा ॥ ५२५ ॥
पहिर न भूषण कनकके, कहि आवत यहि हेत ।
दर्पणकेसे मोरचे, देह दिखाई देत ॥ ५२६ ॥
सोनेके भूषण मत पहने यह बात कहनेमें आती है कि,
दर्पणकेसे मोरचे मेरी देह में दिखाई देते हैं, आशय यह
कि, तू यह मत जाने कि, मैं तेरा गहना उतरवाती
हूँ परन्तु यह तेरे शरीरके सामने मैले लगते हैं। विषमा-
लँकार ॥ ५२६ ॥
लीनेहू साहस सहस, कीने यतन हजार ।
लोयन लोयन सिंधु तन, पैरि न पावत पार ५२७
सहस्र साहस ( हिम्मत ) करके तथा सहस्र यत्न करके
भी शरीररूपी शोभा समुद्र पैर कर आंख पार नहीं पाती

षष्ठशतक ६. ( १७३ )
अर्थात् छबीलीके शोभारूप समुद्रमें तैरते हुए प्रीतमके नेत्र
थकगये । छेकानुप्रास जमकालंकार ॥ ५२७ ॥
दीठि न परत समान द्युति, कनक कनकसे गात।
भूषनकर करकस लगत, परसि छिपाने जात ५२८
कनकसे गात अर्थात् सुवर्णसे शरीरपर कंचन ( सुवर्ण )
दृष्टि तो नहीं पड़ता कारण कि, दोनोंकी समान कांति है
जब वे गहने हाथ में छूनेसे करकस लगते हैं, तब पहचाने
जाते हैं । उन्मीलितालंकार ॥ ५२८ ॥
अंग अंग नग जगमगत, दीपशिखासी देह ।
दिया बढ़ायेहू रहै, बड़ो उजेरो गेह ॥ ५२९ ॥
प्यारीके सब अंग अंग हीरे मोतीसे जगमगाते हैं, दीप-
ककी शिखाके समान सब देह है, दिया बढ़ाये परभी
घरमें बड़ा उजेला रहता है । अतद्गुण पूर्णोपमा ॥ ५२९ ॥
अंग अंग प्रतिबिम्बपर, दर्पणसे सब गात ।
दुहरे तिहरे चौहरे, भूषण जाने जात ॥ ५३० ॥
अंग २ का अंग २ में प्रतिबिम्ब पड़ता है, सब अङ्ग
दर्पणसे चमकते हैं, प्रतिबिम्बके कारण वे भूषण दुहरे तिहरे
चौहरे जाने जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३० ॥
अंग अंग छविकी लपटि, उपजति जात अछेह।

( १७४ ) सतसई-सटीक ।
खरी पातरीऊ तऊ, लगै भरीसी देह ॥ ५३१ ॥
प्यारीके अंग अंगसे छबिकी छटा निरन्तर उपजती
जाती है, यद्यपि अधिक पतली है, परन्तु शोभासे भरीसी
देह लगती है। लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३१ ॥
रंच न लखियत पहरि या, कंचनसे तनु बाल ।
कुँभिलानी जानीपरै, उर चपका माल ॥५३२॥
बालाके सोनेसे शरीरमें पहरी हुई तनकभी नहीं जानी
जाती, परन्तु हृदयपर मुरझानेसे चम्पेकी माला जानी जाती
है। उन्मीलित ॥ ५३२ ॥
त्यों त्यों प्यासेई रहत, ज्यों ज्यों पियत अघाय।
सगुन सलौने रूपको, नहिं चख तृषा बुझाय५३३
ज्यों ज्यों पेट भरकर पीते हैं त्यों त्यों प्यासेही रहतेहैं
गुणवान् सलौने रूपको देखकर नेत्रोंकी प्यास नहीं बुझती।
विशेषोक्ति ॥ ५३३ ॥
लिखनबैठ जाकी सबहि, गहि गहिग रबगरूर ।
भये न केते जगतके, चतुर चितेरे कूर ॥५३४॥
गर्व गरूर ग्रहण करके उसके चित्रको लिखनेको बैठे
जगतके कितने चतुर चित्रकार कूढ़ अर्थात् मूर्ख न होगये ।
विशेषोक्ति सबहि तस्वीर ॥ ५३४ ॥

षट्शतक ६. ( १७५ )
केसर केसर क्यों सकै, चंपक कितिक अनूप।
गातरूप लखि जात दुरि, जातरूपको रूप ५३५
केसर क्या बराबरी करसकती है, और चंपेकी भी क्या
शोभाहै; शरीरका रंग देखकर सोनेके रूपका रूपभी छिप-
जाताहै। प्रतीपालंकार ॥ ५३५ ॥
सोरठा।
तो तनु अधिक अनूप, रूप लगो सब जगतको ।
मो दृग लागे रूप, दृगनि लगी अति चटपटी ५३६
तेरा शरीर शोभाकी महिमा है, सब जगत्का रूप लगा
है, रूपसे मेरे नेत्र लगे हैं; इसीसे नेत्रोंको बड़ी चटपटी लगी
है। आधारमाला ॥ ५३६ ॥
सुकुमारता वर्णन ।
दोहा।
भूषणभार सँभारहीं, क्यों यह तनु सुकुमार ।
सूधो पाँयन धर परत, महि शोभाके भार ५३७
यह सुकुमार अंग भूषणका भार किसप्रकारसे संभाल
सकेंगे; कारणकि शोभाके भारसे सूधे पांव पृथ्वीमें नहीं धर
सकती अथवा स्त्रीकी शोभा कुच नितम्ब हैं उसके बोझसे
पृथ्वीमें सूधे पांव नहीं पडसकते। काकोक्ति अलंकार ५३७

( १७६ ) सतसई-सटीक ।
जनुकु धरत हर हिय धरैं, नाजुक कमला बाल ।
भजत भार भयभीत ह्वै, घन चन्दन वनमाल ५३८
मानों हरि कोमल लक्ष्मी बालांको हृदयमें धारण किये
हुए घना चन्दन और वनमाला धारण करते बोझसे डरते
भीतहो भजते हैं । आशय यह कि, प्यारी चन्दन वनमाला
देने लगी और प्रीतमको रोषकर चलता देख हृदयकी कोम-
लता प्रगट की ॥ ५३८ ॥
छाले परिवेके डरन, सकत न हाथ छुवाय ।
झझकति हिये गुलाबके, झबा झबावति पायँ ५३९
छाले पड़नेके डरसे हाथ नहीं छुवा सकती, हृदयमें
झझकती है गुलाब के झांवेसे पांव झवाती है । सम्बन्धा-
तिशयोक्ति ॥ ५३९ ॥
मैं बरजी कैबार तू, उत कत लेत करोंट ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, परिहैं गात खरोंट ॥५४०॥
अन्तरंग सखीका वचन, मैंने तुझे कईबार निषेध किया
तू उधरको करवट क्यों लेती है, गुलाबकी पँखुरी लगेगी
तो शरीरमें खुरेंट पड़ जायगी, अथवा फूल गेंद खेलते
समय सखीने कहा उस ओरकी करवटसे क्यों बचाव
करती है, गुलाबकी पँखुरीसे खुरेंट पड़ जायँगी । संबंधाति-
शयोक्ति ॥ ५४० ॥

षठशतक ६. ( १७० )
ज्यों कर त्यों चहुँटी चलै, ज्यों चहुँटी त्यों नारि।
छबिसों गतिसी लै चलति, चतुर कातनिहारि ॥
जैसे हाथ चलते हैं वैसेही चुटकी चलती हैं, जिस भाँति
चुटकी चलती हैं उसी भाँति गरदन हिलती है, शोभासे गति लै
चलती है इस प्रकार चतुर कातनेवाली "जातिअलं०" ५४१
गर्भिणी वर्णन ।
दृग थिरको हैं अधखुले, देह थको हैं ढार ।
सुरत सुखितसी देखियत, दुखित गर्भके भार ॥
नेत्र चञ्चल, अधखुले, देह थकित सुरतके अंतमें जैसे
सुखीसी दीखती है, उस प्रकार यह गर्भके भारसे दुःखित है
"जातिअलंकार" ॥ ५४२ ॥
गँवारी वर्णन ।
गोरी गदकारी परत, हँसत कपोलनि गाड ।
केसी लसत गँवारि वह, सुनकिरवाकी आड ॥
गोरी गुदगुदी है, हँसते हुए गालोंमें गड्ढे पड़ते हैं, सुन-
किरवाकी आड़ लगाये वह गँवारी कैसी शोभित होती है,
सुनकिरवा एक कीड़ा है, इसको सोनपटोला कहते हैं,
इसके पंख पन्नेके रंगके होते हैं "जाति अलंकार" ॥५४३॥

( १७८ ) सतसई-सटीक ।
प्रफुलाहार हिये लसै, सनकी बेंदी भाल ।
राखत खेत सरीखरी, खरे उरोजन बाल॥५४४॥
प्रफुला (कुडा) वृक्षके फूलोंका हार छातीपर शोभा देता
है माथेपर सनके फूलकी बेंदी लगाये है खरे उरोज स्तन-
वाली खडी खडी खेत रखाती है “श्लेषालंकार” ॥५४४॥
रतिमहिमा ।
चमक तमक हांसीसिसक, मसक झपटलिपटानि।
ए जहँरतिसोरतिमुकति, और मुकतिअतिहानि॥
चमकना तमकना हँसी सिसकारी मसकना झपटना और
लिपट जाना यह जहां रतिहै वेही रति मुक्त हैं और मुक्तिकी
तौ अतिहानि है ॥ ५४५ ॥
तनकौ झँठनि स्वादली, क्यों न बात परिजाय ।
तियमुखरति आरंभकी, नहिंजूंठियेमिठाय ५४६
तनकभी झूठसे स्वादवाली बात स्वादहीन हो जातीहै. प-
रन्तु प्रियाके मुखसे रतिके आरंभकी झूठी नहींही प्यारी ल-
गतीहै। अयुक्तायुक्त ॥ ५४६ ॥
जो न युक्ति पिय मिलनकी, धूरिमुकति मुँह दीन।
ज्योंलहियेसखिसजनतौं, धरकनरकहूकीन ५४७

षट्शतक ६. ( १७१ )
जो प्यारेके मिलनेकी युक्ति नहीं है तो मुक्तिके सुखमें धूरि
दी और जो सजनका संग मिले तो नरककाभी डर मैने त्याग
किया “अनुज्ञा” ॥ ५४७ ॥
प्रभातवर्णन ।
कुंजभवन तज भवनको, चलिये नन्दकिशोर ।
फूलत कली गुलाबकी, चटकाहट चहुँओर ५४८॥
हे नन्दकिशोर! अब कुञ्जभवनको त्यागकर भवनको च-
लिये कारण कि, गुलाबकी कली फूलती है उसकी चटकाहट
चारों ओर है अथवा चिड़ियोंकी चुचुहाटके समान कली
चटकती है तात्पर्य यह कि, प्रभात होगया “काकोक्ति” ५४८
हिंडोरा वर्णन ।
हेरि हिंडोरे गगनतें, परी परीसी टूटि ।
धरी धाय पियबीचहीं, करी खरी रस लूटि ५४९॥
हे सखी! देख यह हिंडोलारूपी आकाशसे परीसी टूटकर
ज्योंही गिरी कि, प्रीतमने दौड़कर बीचहीमें धारण किया
बड़ी खरी रसकी लूट की, अथवा प्यारेको हृदय लगाय
रस लूटकर खरी करी “यमकउपमेयलुप्ता” ॥ ५४९ ॥
बरजे दुनी हठ चढ़े, नाम कूँच न मँकाइ ।
टूटति कटि ड्रमचा मचक, लचकि रुचिजाय ॥

( १८० ) सतसई-सटीक ।
प्रीतमके बरजनेसे दूनी होड चढ़ती है हिंडोलेपर न सकुचती
है न डरती है दोनों ओरके बोझसे कमर लचकती है अर्थात्
नितम्ब और छातीके बोझसे लचक २ कर बचजाती है।
"तृतीय विभावना वीप्सालंकार" हुमची-झोटालेना॥५६०॥
जलविहारवर्णन ।
ले चुभकी चलिजात तित, जित जलकेलि अधीर।
कीजत केसरनीरसों, तित तित केसरनीर ५६१॥
प्रिया जलमें गोता मारकर जिधर तिधर चलीजाती है
और जलकेलिमें अधी होरही है, अपने शरीरमें लगे केश-
रके नीरसों जिधर तिधर केशरका नीर करती है "धर्मलु-
प्तालंकार" ॥ ५६१ ॥
विहँसति सकुचतिसी हिये, कुच आँचरबिच बाँह।
भीजे पट घरको चली, न्हाय सरोवरमाँह॥५६२॥
हृदयमें सकुचती और मनमें हँसतीसी छातीके अंचलके
बीच हाथ दिये सरोवरमें स्नानकर प्रिया भीजे वस्त्र घरको
चली "जातिअलंकार" ॥ ५६२ ॥
मुख पखार मुडहर भिजैं, शीशसजलकर छाय।
मोरि उँचै धुवैं नैन, नारि सरोवर न्हाय॥५६३॥

षष्ठशतक ६. ( १८१ )
मुख धोय जल हाथमें ले शिरको झुवाय बालोंको भिजोय
मुड़कर ऊँची होकर घुटनोंतक नवकर नारि सरोवरमें स्नान
करतीहै "जातिअलंकार" ॥ ५५३ ॥
छिरके नाह नवोढ दृग, करि पिचकी जलजोर ।
रोचनरँग लाली भई, विय तिय लोचनकोर ५५४॥
प्रीतमने जलके जोरसे नवोढाके नेत्र छिड़के, और
उसीसमय दूसरी सौतके नेत्रोंकि कोयोंमें गोरोचनके समान
लालीहुई "असंगति" ॥ ५५४ ॥
चलतललितश्रमस्वेदकण, कलितअरुणमुखऐन ।
वनविहारथाकी तरुनि, खरे थकाये नैन ॥५५५॥
चलनेसे जो मनोहर पसीनेके कण आगये उससे मुख-
रूपी स्थान लालीकी शोभायुक्त हुआ; और जब विहारकर
तरुणी थकित हुई तब उसके प्रीतमके नैन उसे देखते २ थ-
कित होगये । “ जाति० ” ॥ ५५५ ॥
बढतविकसिकुचकोररुचि, कढ़त गौरभुजमूल ।
मनु लुटगो लोटनु चढत, चूटत ऊँचे फूल ५५६॥
प्रियवचन सखीसे, जिस समय वह ऊँचा हाथकर फूल चोंट-
रही अर्थात् तोड़रहीथी उससमय खिलेहुए उसके कुचके

( १८२ ) सतसई-सटीक ।
कोरकी कांतिको बढते, तथा गोरी भुजाकी मूल और त्रिवली
देखकर मेरा मन लुटगया “ विभावना ” ॥ ५५६ ॥
अपने गुहिकर आपही, हिय पहिराइ लाल ।
नौलसिरी औरै चढ़ी, मौलसिरीकी माल ५५७॥
कृष्ण ने अपने हाथसे आपही गूँथकर प्यारीके हृदयमें
माला पहराई उस मौलसिरीकी मालासे बालाके नई
शोभा कुछ औरही चढ़ी “भेदकातिशयोक्ति छेकानुप्रास”
नौल-नवल ॥ ५५७ ॥
तूज्यौंउझकिझाँपतिवदन, झुकतिविहँसिसतराय।
त्यौंगुलालमुठीझुठी, झझकावतु पियजाय ५५८
तू ज्यों २ उझककर मुख ढकती है निहुड़ती और हँसती
है त्यों त्यों गुलालकी झूठी मूठीसे प्रीतम झझकाजाताहै
“पर्यायोक्ति स्वभावोक्ति” ॥ ५५८ ॥
पीठ दियेही नेक मुरि, कर घूँघटपट टारि ।
भरि गुलालकी मूठिसों, गई मूठसी मारि ५५९॥
वह पीठ फेरेही नेक मुरिकर हाथसे घूँघटपट टारकर
गुलालकी मूठी भरकर जादूकी मूठसी मारगई “ जातिअ-
लंकार यमक” ॥ ५५९ ॥

षष्ठशतक ६. ( १८३ )
दियोजु पियलखिचखनिमैं, खेलत फागुखियाल।
बाढ़तहू अतिपीर सुनि, काढ़त बनत गुलाल५६०
हे सखी ! उसके प्रीतमने जो फाग खेलते समय उसकी
आंखोंमें गुलाल डाल दिया अतिपीर बढ़नेपर भी गुलाल
काढ़ते नहीं बनता पीर होनेका कारण यह कि प्रीतमके दर्श-
नमें बाधा पड़तीहै “अनुज्ञालंकार”॥ ५६० ॥
छुटत मुठी संगहि छुटी, लोकलाज कुलचाल ।
लगे दुहिन इकबारही, चलचित नैन गुलाल५६१
मूठीके छूटते साथही लोकलाज और कुलकी चाल छुटी
दोनोंके चलचित्त नयन और गुलाल एक साथही लगे “स-
होक्ति” ॥ ५६१ ॥
गिरे कम्पि कछु कछु रहे, कर पसीज लपटाय ।
डारतमुठी गुलालकी, छुटतझूँठी ह्वै जाय ॥५६२॥
हे सखी ! कुछ तो हाथ कम्पित होनेसे गिरताहै कुछ हाथ
पसीज रहेहैं उनसे लपटजाताहै गुलालकी मुट्ठी डालनाहै प-
रन्तु छूटनेकी झूठी होजातीहै सात्त्विक होनेसे हाथोंमें कम्प
और पसीजना होताहै “विशेषोक्ति” ॥ ५६२ ॥
ज्यों ज्यों पटक झटक हटति, हँसतिनचावतिनैन।
त्यों त्यों निपट उदारह्वै, फगुआ देतबैनन ॥५६३॥

( १८४ ) सतसई-सटीक ।
प्यारी ज्यों ज्यों वस्त्रको पटकती झटकती हटकती नेत्र
नचाती हँसतीहै त्यों त्यों निपट उदार प्रीतमकोभी फगुआ
देते नहीं बनता, आशय यह कि, फगुआ देनेसे फिर यह
लीला न करेगी "विशेषोक्ति" उदारता होकर भी न देना ५६३
रसभिजयेदोऊदुहुनि, तउटिकरहे टरैंन ।
छबिसों छिरकत प्रेमरँग, भरिपिचकारीनैन ५६४॥
रससे दोनोंने दोनोंको भिजोदिया, तो भी डटरहे हैं टारेसे
टलते नहीं छबिसे प्रेमका रंग छिड़कते हैं और वह प्रेमका रंग
नेत्रोंकी पिचकारीमें भरते हैं "रूपक" [रस-प्रेम, जल] ५६४
छकि रसाल सौरभ सन, मधुर माधुरी गन्ध ।
ठौर ठौर झोरत फिरत, भौंरभीर मधु अंध ५६५॥
मोरकी सुगन्धसे छकके तथा मीठी माधुरी गंधमें सनकर
मकरन्दके मद्यसे अंधीहुई भौरोंकी भीर ठौरठौर गूंजती फि-
रतीहै "जाति अलंकार" ॥ ५६५ ॥
दिशिदिशि कुसुमितदेखिये, उपवन विपिनसमाज।
मनहुवियोगनकोकियो, शरपञ्जरऋतुराज ५६६
दिशा दिशाओंमें उपवन और वनका समाज फूलाहुवा
है मानों वसन्तऋतुने वियोगियोंको बाणोंका पींजरा कियाहै,
जैसे बहेलिये पक्षियोंको पकडनेको जाल बिछाते हैं इसप्र-

षष्ठशतक ६. ( १८५ )
कारसे वसन्तने फूलोंका पींजरा कियाहै विरहीजनोंके वि-
रुद्ध किया है "उत्प्रेक्षालंकार" ॥ ५६६ ॥
फिर घरको नूतन पथिक,चले चकित चितभागि।
फूल्यो देखि पलाशवन,समुहैसमुझिदवागि५६७
नवीन पथिक चकित चित्त होकर घरको फिरकर भाग
चले, वनमें ढाका फूला देखकर सामने आग लगी हुई जानी
"भ्रान्त्यालंकार" ॥ ५६७ ॥
नाहिं न ये पावक प्रवल, लुएँ चलत चहुँपास ।
मानहुविरहवसन्तके, ग्रीषमलेतउसास ॥५६८॥
यह प्रवल अग्नि नहीं हे, जो चारों ओर लुएँ चलती
हैं मानों वसन्तके विरहमें ग्रीष्म उसास लेता हे
"हेतूत्प्रेक्षा" ॥ ५६८ ॥
कहलाने एकत रहत,अहि मयूर मृग बाघ ।
जगत तपोवनसो कियो, दीरघ दाघ निदाघ ॥
दुःख पाकर एकत्र रहते हैं सर्प, मोर, मृग और सिंह
ग्रीष्मकी बड़ी गर्मीने संसारको तपोवनसा करदिया हे जैसे
तपोवनमें सब जीव निर्वैर रहते हैं इसप्रकार गर्मीसे व्याकु-
ल हो यह सब जीव एकत्र स्थित हैं "पूर्णोपमा" दीरघ-
बडी । दाघ-दाह । निदाघ-गर्मी ॥ ५६९ ॥

( १८६ ) सतसई-सटीक ।
बैठिरही अति सघनवन, पैठि सदनमनमाँहि ।
निरखि दुपहरी जेठकी,छाँहौं चाहत छाँहि ५७०
अतिघने वनमें, अथवा मनरूपी घरमें बैठरहीं जेठकी
दुपहरी देखकर छाँहभी छाँह चाहती है वृक्षके नीचे छाँह
मानों दुपहरी देखकर आती है आशय यह कि,ज्येष्ठमें सघन
वन या मनके भीतरही छाँह मिलसकती है "हेतूत्प्रेक्षा"५७०
पावस घन अँधियारमें, रहो भेद नहिं आन ।
राति द्योस जान्यो परे,लखि चकई चकवान ५७१
वर्षाऋतुके घने अंधकार और रात्रिमें कुछ भेद नहीं
रहा केवल चकवा चकवीकोही देखकर रात दिनका बोध
होता है जब वह पृथक् हो बोलने लगते हैं तब रात जब
संयुक्त होते हैं तब दिनका बोध होता है "परिसंख्यालंकार"
पावस वर्णन है ॥ ५७१ ॥
तिय तरसोहें मुनि किये, करि सरसोहें नेह ।
धर परसोहें ह्वै रहे, झरबरसोहें मेह ॥ ५७२ ॥
हे तिया! तैं ने प्रेमसे सरस करके मुनिजन भी तरसत हुए
करदिये यह झरसे वरसनवाले मेघ पृथ्वीको छूते हुएसे
होरहे हैं ॥ ५७२ ॥
कुढँग कोप तजि रँगरली,करत युवति जग जोय।

षष्ठशतक ६. ( १८७ )
पावस बात न गूढ यह, वूढीहू रंग होय ॥५७३॥
अरी मानवती यही कुढंगका क्रोध त्यागकर; जगमें जो
रंगीली स्त्री हैं सो आनंद करती हैं पावसऋतुमें यह बात
छिपी नहीं है वूढियोंकोभी रंग होता है "काव्यलिंग और
श्लेष" ॥ ५७३ ॥
हठ न हठीली करसकै, इहि पावस ऋतु पाय ।
आन गांठि छुटिजाय त्यों, मानगांठि छुटिजाय॥
इस पावस ऋतुको प्राप्त करके हठीली हठ नहीं करस-
कती । पावस ( वर्षा ) को पाकर जैसे और गांठ छुटजाती
है इसीप्रकार मान गाँठभी छूट जाती है "विभावना-
लंकार" ॥ ५७४ ॥
वेऊ चिरजीवी अमर, निधरक फिरो कहाय ।
छिन बिछुरै जिनकी नहिं न, पावस आव सिराय ॥
वेही चिरंजीवी अमर कहाकर निधडक फिरो कि, जि-
नकी वर्षाऋतुमें क्षणमात्रकोभी पृथक होनेकी प्रतिज्ञा
नहीं गई है, अर्थात् जो पियाके बिना पावसमें जीती रहें
वेही अमर जानो "मरणाक्षेपालंकार" ॥ ५७५ ॥
अब तज नाम उपायको, आयो सावनमास ।
खेलन रहिबो खमसों, केम कुसुमकी बास॥५७६॥

( १८८ ) सतसई-सटीक ।
सखी अब सावन महीना आगया विरह दूर होनेके उपा-
यका नाम त्यागदो कदम्बफूलकी गन्धसे कुशलपूर्वक रहना
कोई खेल नहीं है “लोकोक्ति” शरद्वर्णन ॥ ५७६ ॥
घन घेरो छुटिगो हरषि, चली चहूँ दिशि राह ।
कियो सुचैनो आय जग, शरद शूर नरनाह ५७७॥
मेघोंका घेरा छूटगया प्रसन्नहो चारों दिशाओंके मार्ग
चले शरद् ऋतुरूपी शूर राजाने आकर जगतको सुचैन
किया “रूपालंकार” ॥ ५७७ ॥
अरुणसरोरुह कर चरण, दृग खंजन मुखचंद ।
समय आय सुन्दरि शरद, काहि न करत अनंद॥
लाल कमलरूपी हाथ पैर, खञ्जन नेत्र, चन्द्रमारूप
मुखसे सुन्दर शरद्का समय आकर किसको आनंदित नहीं
करता “रूपकालंकार” ॥ ५७८ ॥
हेमन्तवर्णन ।
ज्यों ज्यों बढति विभावरी, त्यों त्यों बढत अनन्त।
ओक ओक सबलोक सुख, कोक शोक हेमन्त॥
ज्यों ज्यों रात बढती है, त्यों त्यों सबलोकमें घर घर
आनंद बढते हैं हेमन्तमें चक्रवाकोंको शोक है कारण किं,
बडी रातमें उनको अधिक वियोग होता है “निदर्शना-
लंकार” ॥ ५७९ ॥

षट्शतक ६. ( १८९ )
मिलिविहरतबिछुरत मरत,दम्पति अति रसलीन।
नूतन विधि हेमन्त सब,जगत जुराफा कीन ५८०
दोनों स्त्री पुरुष रसमें लीन होकर विहार करते हैं वियु-
क्त होतेही मृतकवत् दुःखी होते हैं जाडेने अनोखी रीतिसे
सब जगत् जुराफेके समान कियाहै जुराफा एक पक्षी होताहै
ईरानमें इसको गावपलंग कहते हैं पैर गायकेसे, रंग चीतेकासा,
आशय यह कि, जैसा वह रंगबिरंगा होताहै इसीप्रकार उसने
जगत्‌को रंग बिरंगा कियाहै अर्थात् माह धूपमें लोग अनेक
प्रकारकी छींट शाल दुशाले पहनकर रंग बिरंगे होजाते हैं
अथवा जुराफः अफ्रीका देशके नूबह देशका पशुहै यह
सिंहके समान चित्तल और ऊंट के समान लम्बी गर्दन-
वाला होता है इनका जोडा बिछुड़नेसे दम्पतिका मरण हो-
ता है "रूपकालंकार" ॥५८०॥
कियो सबै जग कामवश, जीते सबै अजेय।
कुसुमशरहिं शर धनुपकर, अगहन गहन न देय॥
जिसने सब जगत्‌को कामके आधीन किया, सब अजे-
योंको जीतलिया अगहनका महीना उसी कामदेवके, धनुष
बाण हाथमें धारण करने नहीं देता अर्थात् जाडेमें उसके हाथ
पैरभी सुकड़ते हैं "अभिप्राय विशेष" ॥५८१॥

( १९० ) सतसई-सटीक ।
आवत जात न जानियत, तेजहि तजि सियराना।
घरहि जमाईलों धस्यो, खस्यो पूषदिनमान५८२
आते और जाते जाना नहीं जाता तेजको त्यागकर शी-
तल होगया है घरमें जमाईकी सम घुसा हुआ पूषका दिन
खसकताहै आशय यह ससुरालमें जमाईभी सकुचवश शीतल
हुआ रहताहै " पूर्णोपमा" ॥ ५८२ ॥
तपनतेज तपताप तन, तूल तुलाई माह ।
शिशिर शीत क्योंहुनघटै, बिनलपटेटियबांह५८३
सूर्यके तेजसे आगके तापनेसे रुईकी रजाईसेभी माहके
महीनेमें बिना प्यारीको भुजा भरके लपटाये शिशिरका
शीत किसी भांति नहीं घटता "परिसंख्या"[ दो०-कहूँ तो
अर्थ निषेधकर, और कहूँ ठहराय। तेहि परिसंख्या कहत हैं,
सो यहँ प्रगट लखाय] ॥ ५८३ ॥
लगतसुभगशीतलकिरण, निशदिनसुखअवगाहि
माहशशीभ्रमसूरत्यों, रहतचकोरीचाहि॥५८४ ॥
सूर्यकी किरण दिन रातके समान सुखदायक और शीत-
ल विदित होतीहै दिनमेंही यह सुख विचारकर माह महीनेमें
चकोरी सूरजको भ्रमसे चन्द्रमा जानकर देखरही है " भ्रांति
अलंकार " ॥ ५८४ ॥

षट्शतक ६. ( ५०.१ )
रह न सकी सब जगतमें, शिशिरशीतके पास ।
गरमिभाजगढमेंगई, तियकुचअचलमवास५८५
शीतके त्राससे गरमी इस जगतमें रह नहीं सकी इसका-
रण तियके कुचरूपी पहाडके मवासपर गढमें भाजकर
गरमी हुई अर्थात् छिपी । मवास-शरणस्थान "लुप्तोत्प्रेक्षारू-
पकालंकार" ॥ ५८५ ॥
रणित भृंग घंटावली, झरित दान मधुनीर ।
मन्द मन्द आवत चल्यो, कुंजर कुंज समीर५८६
भौंरोंकी ध्वनिही मानों घंटोंका समूहहै, मधु नीररूप
जिसमें मद झरताहै इसप्रकार कुंजमें पवनरूपी हाथी सहज
सहज चलाआताहै "रूपकालंकार" ॥ ५८६ ॥
रुक्यो सांकरेकुंजमग, करत झांझ झुकरात ।
मन्द मन्द मारुत तुरंग, खुदरत आवतजात५८७॥
संकीर्ण कुंजमार्गमें रुककर झांझ करना और झुकराता
है, सहज २ पवनरूपी घोडा खूँदता हुआ आताजाता है ।
सांकरे-कमचौडा । झांझ-चिरचिराहट । झुकरात-उधर उ-
धर झकोरालेना, खुदरत-खूँदना "रूपकालंकार" ॥५८७॥
चुवत स्वेद मकरन्दकण, तरुतरुतर विश्रमाय ।
आवतदक्षिणतें चल्यो, थक्योबटोहीवाय॥५८८॥