बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) सतसई-सटीक ।
प्रीतमके बरजनेसे दूनी होड चढ़ती है हिंडोलेपर न सकुचती
है न डरती है दोनों ओरके बोझसे कमर लचकती है अर्थात्
नितम्ब और छातीके बोझसे लचक २ कर बचजाती है।
"तृतीय विभावना वीप्सालंकार" हुमची-झोटालेना॥५६०॥
जलविहारवर्णन ।
ले चुभकी चलिजात तित, जित जलकेलि अधीर।
कीजत केसरनीरसों, तित तित केसरनीर ५६१॥
प्रिया जलमें गोता मारकर जिधर तिधर चलीजाती है
और जलकेलिमें अधी होरही है, अपने शरीरमें लगे केश-
रके नीरसों जिधर तिधर केशरका नीर करती है "धर्मलु-
प्तालंकार" ॥ ५६१ ॥
विहँसति सकुचतिसी हिये, कुच आँचरबिच बाँह।
भीजे पट घरको चली, न्हाय सरोवरमाँह॥५६२॥
हृदयमें सकुचती और मनमें हँसतीसी छातीके अंचलके
बीच हाथ दिये सरोवरमें स्नानकर प्रिया भीजे वस्त्र घरको
चली "जातिअलंकार" ॥ ५६२ ॥
मुख पखार मुडहर भिजैं, शीशसजलकर छाय।
मोरि उँचै धुवैं नैन, नारि सरोवर न्हाय॥५६३॥