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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 226

षष्ठशतक ६. ( १७३ )
अर्थात् छबीलीके शोभारूप समुद्रमें तैरते हुए प्रीतमके नेत्र
थकगये । छेकानुप्रास जमकालंकार ॥ ५२७ ॥
दीठि न परत समान द्युति, कनक कनकसे गात।
भूषनकर करकस लगत, परसि छिपाने जात ५२८
कनकसे गात अर्थात् सुवर्णसे शरीरपर कंचन ( सुवर्ण )
दृष्टि तो नहीं पड़ता कारण कि, दोनोंकी समान कांति है
जब वे गहने हाथ में छूनेसे करकस लगते हैं, तब पहचाने
जाते हैं । उन्मीलितालंकार ॥ ५२८ ॥
अंग अंग नग जगमगत, दीपशिखासी देह ।
दिया बढ़ायेहू रहै, बड़ो उजेरो गेह ॥ ५२९ ॥
प्यारीके सब अंग अंग हीरे मोतीसे जगमगाते हैं, दीप-
ककी शिखाके समान सब देह है, दिया बढ़ाये परभी
घरमें बड़ा उजेला रहता है । अतद्गुण पूर्णोपमा ॥ ५२९ ॥
अंग अंग प्रतिबिम्बपर, दर्पणसे सब गात ।
दुहरे तिहरे चौहरे, भूषण जाने जात ॥ ५३० ॥
अंग २ का अंग २ में प्रतिबिम्ब पड़ता है, सब अङ्ग
दर्पणसे चमकते हैं, प्रतिबिम्बके कारण वे भूषण दुहरे तिहरे
चौहरे जाने जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३० ॥
अंग अंग छविकी लपटि, उपजति जात अछेह।