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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 227

( १७४ ) सतसई-सटीक ।
खरी पातरीऊ तऊ, लगै भरीसी देह ॥ ५३१ ॥
प्यारीके अंग अंगसे छबिकी छटा निरन्तर उपजती
जाती है, यद्यपि अधिक पतली है, परन्तु शोभासे भरीसी
देह लगती है। लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३१ ॥
रंच न लखियत पहरि या, कंचनसे तनु बाल ।
कुँभिलानी जानीपरै, उर चपका माल ॥५३२॥
बालाके सोनेसे शरीरमें पहरी हुई तनकभी नहीं जानी
जाती, परन्तु हृदयपर मुरझानेसे चम्पेकी माला जानी जाती
है। उन्मीलित ॥ ५३२ ॥
त्यों त्यों प्यासेई रहत, ज्यों ज्यों पियत अघाय।
सगुन सलौने रूपको, नहिं चख तृषा बुझाय५३३
ज्यों ज्यों पेट भरकर पीते हैं त्यों त्यों प्यासेही रहतेहैं
गुणवान् सलौने रूपको देखकर नेत्रोंकी प्यास नहीं बुझती।
विशेषोक्ति ॥ ५३३ ॥
लिखनबैठ जाकी सबहि, गहि गहिग रबगरूर ।
भये न केते जगतके, चतुर चितेरे कूर ॥५३४॥
गर्व गरूर ग्रहण करके उसके चित्रको लिखनेको बैठे
जगतके कितने चतुर चित्रकार कूढ़ अर्थात् मूर्ख न होगये ।
विशेषोक्ति सबहि तस्वीर ॥ ५३४ ॥