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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 229

( १७६ ) सतसई-सटीक ।
जनुकु धरत हर हिय धरैं, नाजुक कमला बाल ।
भजत भार भयभीत ह्वै, घन चन्दन वनमाल ५३८
मानों हरि कोमल लक्ष्मी बालांको हृदयमें धारण किये
हुए घना चन्दन और वनमाला धारण करते बोझसे डरते
भीतहो भजते हैं । आशय यह कि, प्यारी चन्दन वनमाला
देने लगी और प्रीतमको रोषकर चलता देख हृदयकी कोम-
लता प्रगट की ॥ ५३८ ॥
छाले परिवेके डरन, सकत न हाथ छुवाय ।
झझकति हिये गुलाबके, झबा झबावति पायँ ५३९
छाले पड़नेके डरसे हाथ नहीं छुवा सकती, हृदयमें
झझकती है गुलाब के झांवेसे पांव झवाती है । सम्बन्धा-
तिशयोक्ति ॥ ५३९ ॥
मैं बरजी कैबार तू, उत कत लेत करोंट ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, परिहैं गात खरोंट ॥५४०॥
अन्तरंग सखीका वचन, मैंने तुझे कईबार निषेध किया
तू उधरको करवट क्यों लेती है, गुलाबकी पँखुरी लगेगी
तो शरीरमें खुरेंट पड़ जायगी, अथवा फूल गेंद खेलते
समय सखीने कहा उस ओरकी करवटसे क्यों बचाव
करती है, गुलाबकी पँखुरीसे खुरेंट पड़ जायँगी । संबंधाति-
शयोक्ति ॥ ५४० ॥