बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७८ ) सतसई-सटीक ।
प्रफुलाहार हिये लसै, सनकी बेंदी भाल ।
राखत खेत सरीखरी, खरे उरोजन बाल॥५४४॥
प्रफुला (कुडा) वृक्षके फूलोंका हार छातीपर शोभा देता
है माथेपर सनके फूलकी बेंदी लगाये है खरे उरोज स्तन-
वाली खडी खडी खेत रखाती है “श्लेषालंकार” ॥५४४॥
रतिमहिमा ।
चमक तमक हांसीसिसक, मसक झपटलिपटानि।
ए जहँरतिसोरतिमुकति, और मुकतिअतिहानि॥
चमकना तमकना हँसी सिसकारी मसकना झपटना और
लिपट जाना यह जहां रतिहै वेही रति मुक्त हैं और मुक्तिकी
तौ अतिहानि है ॥ ५४५ ॥
तनकौ झँठनि स्वादली, क्यों न बात परिजाय ।
तियमुखरति आरंभकी, नहिंजूंठियेमिठाय ५४६
तनकभी झूठसे स्वादवाली बात स्वादहीन हो जातीहै. प-
रन्तु प्रियाके मुखसे रतिके आरंभकी झूठी नहींही प्यारी ल-
गतीहै। अयुक्तायुक्त ॥ ५४६ ॥
जो न युक्ति पिय मिलनकी, धूरिमुकति मुँह दीन।
ज्योंलहियेसखिसजनतौं, धरकनरकहूकीन ५४७