बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्शतक ६. ( १७१ )
जो प्यारेके मिलनेकी युक्ति नहीं है तो मुक्तिके सुखमें धूरि
दी और जो सजनका संग मिले तो नरककाभी डर मैने त्याग
किया “अनुज्ञा” ॥ ५४७ ॥
प्रभातवर्णन ।
कुंजभवन तज भवनको, चलिये नन्दकिशोर ।
फूलत कली गुलाबकी, चटकाहट चहुँओर ५४८॥
हे नन्दकिशोर! अब कुञ्जभवनको त्यागकर भवनको च-
लिये कारण कि, गुलाबकी कली फूलती है उसकी चटकाहट
चारों ओर है अथवा चिड़ियोंकी चुचुहाटके समान कली
चटकती है तात्पर्य यह कि, प्रभात होगया “काकोक्ति” ५४८
हिंडोरा वर्णन ।
हेरि हिंडोरे गगनतें, परी परीसी टूटि ।
धरी धाय पियबीचहीं, करी खरी रस लूटि ५४९॥
हे सखी! देख यह हिंडोलारूपी आकाशसे परीसी टूटकर
ज्योंही गिरी कि, प्रीतमने दौड़कर बीचहीमें धारण किया
बड़ी खरी रसकी लूट की, अथवा प्यारेको हृदय लगाय
रस लूटकर खरी करी “यमकउपमेयलुप्ता” ॥ ५४९ ॥
बरजे दुनी हठ चढ़े, नाम कूँच न मँकाइ ।
टूटति कटि ड्रमचा मचक, लचकि रुचिजाय ॥