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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 228

षट्शतक ६. ( १७५ )
केसर केसर क्यों सकै, चंपक कितिक अनूप।
गातरूप लखि जात दुरि, जातरूपको रूप ५३५
केसर क्या बराबरी करसकती है, और चंपेकी भी क्या
शोभाहै; शरीरका रंग देखकर सोनेके रूपका रूपभी छिप-
जाताहै। प्रतीपालंकार ॥ ५३५ ॥
सोरठा।
तो तनु अधिक अनूप, रूप लगो सब जगतको ।
मो दृग लागे रूप, दृगनि लगी अति चटपटी ५३६
तेरा शरीर शोभाकी महिमा है, सब जगत्का रूप लगा
है, रूपसे मेरे नेत्र लगे हैं; इसीसे नेत्रोंको बड़ी चटपटी लगी
है। आधारमाला ॥ ५३६ ॥
सुकुमारता वर्णन ।
दोहा।
भूषणभार सँभारहीं, क्यों यह तनु सुकुमार ।
सूधो पाँयन धर परत, महि शोभाके भार ५३७
यह सुकुमार अंग भूषणका भार किसप्रकारसे संभाल
सकेंगे; कारणकि शोभाके भारसे सूधे पांव पृथ्वीमें नहीं धर
सकती अथवा स्त्रीकी शोभा कुच नितम्ब हैं उसके बोझसे
पृथ्वीमें सूधे पांव नहीं पडसकते। काकोक्ति अलंकार ५३७