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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 225

( १७२ ) सतसई-सटीक ।
अरगटही फानूससी, परगट होत लखाय ॥५२४॥
वह बाला छबीली स्त्रियोंमें आप छिपकर बैठी परन्तु
घूँघटहीमें फानूससी प्रगट होकर दीखती है। पूर्णोपमा ५२४॥
करत मलिन आछी छविहि, हरतु जु सहजविकास
अंगराग अंगनि लज्यो, ज्यों आरसी उसास ५२५
यह तनुकी अच्छी छबिको मलीन करती है, स्वाभाविक
विकास ( चमक ) को हरण करता है, यह अंगोंमें लगा-
हुआ अंगराग ऐसा है, जैसे आरसीके स्वच्छ दर्पणपर, श्वा-
सकी भाप । पूर्णोपमा ॥ ५२५ ॥
पहिर न भूषण कनकके, कहि आवत यहि हेत ।
दर्पणकेसे मोरचे, देह दिखाई देत ॥ ५२६ ॥
सोनेके भूषण मत पहने यह बात कहनेमें आती है कि,
दर्पणकेसे मोरचे मेरी देह में दिखाई देते हैं, आशय यह
कि, तू यह मत जाने कि, मैं तेरा गहना उतरवाती
हूँ परन्तु यह तेरे शरीरके सामने मैले लगते हैं। विषमा-
लँकार ॥ ५२६ ॥
लीनेहू साहस सहस, कीने यतन हजार ।
लोयन लोयन सिंधु तन, पैरि न पावत पार ५२७
सहस्र साहस ( हिम्मत ) करके तथा सहस्र यत्न करके
भी शरीररूपी शोभा समुद्र पैर कर आंख पार नहीं पाती