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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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षठशतक ६. ( १७० )
ज्यों कर त्यों चहुँटी चलै, ज्यों चहुँटी त्यों नारि।
छबिसों गतिसी लै चलति, चतुर कातनिहारि ॥
जैसे हाथ चलते हैं वैसेही चुटकी चलती हैं, जिस भाँति
चुटकी चलती हैं उसी भाँति गरदन हिलती है, शोभासे गति लै
चलती है इस प्रकार चतुर कातनेवाली "जातिअलं०" ५४१
गर्भिणी वर्णन ।
दृग थिरको हैं अधखुले, देह थको हैं ढार ।
सुरत सुखितसी देखियत, दुखित गर्भके भार ॥
नेत्र चञ्चल, अधखुले, देह थकित सुरतके अंतमें जैसे
सुखीसी दीखती है, उस प्रकार यह गर्भके भारसे दुःखित है
"जातिअलंकार" ॥ ५४२ ॥
गँवारी वर्णन ।
गोरी गदकारी परत, हँसत कपोलनि गाड ।
केसी लसत गँवारि वह, सुनकिरवाकी आड ॥
गोरी गुदगुदी है, हँसते हुए गालोंमें गड्ढे पड़ते हैं, सुन-
किरवाकी आड़ लगाये वह गँवारी कैसी शोभित होती है,
सुनकिरवा एक कीड़ा है, इसको सोनपटोला कहते हैं,
इसके पंख पन्नेके रंगके होते हैं "जाति अलंकार" ॥५४३॥