बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पंचमशतक ५. - ( १६३ )
कन अँगुरी गोरी है नख लाल हैं छल्ला काला छबिदे-
रहा है यही क्रमसे गंगा सरस्वती और यमुना हैं, हे नेत्र !
यह त्रिवेणी सेयकर क्षणमें रतिरुपी मुक्ति होजाती है ।
रूपका० ॥ ४९६ ॥
चलन न पावत निगममग, जग उपजो अति त्रास
कुच उतंग गिरिवर गहो,मीना मैन मवास४९७॥
अब शास्त्रका मार्ग नहीं चलनेपाता जगतमें अति त्रास
उपज रहा हे कारण कि. कामरूपी भीलने स्तनरूपी ऊँचे
पर्वतोंकी कठिन ठौरमें अपना निवास कर रक्खा हे निगम-
मग-जिस मार्गकी खबर न पड़े । मवास-कठिन ठौर “रूपका-
लंकार” मेवाडके रहनेवाली जातके लोग जो लुटेरे हैं वह
मीना कहाते हैं वे वन पहाड़ोंकी कंदरामें रहते हैं ॥ ४९७॥
गाढ़े ठाढ़े कुच न ढिल, को पियहिय ठहराय ।
उकसों हँही तो हिये, दई सवत उकसाय ४९८॥
इन घने कठोर कुचोंके सामने ढिलकर पियाके सामने
कौन सौत ठहरेगी, तेरे स्तनोंने उकसनेही नायकके मनसे
सब सौतें हटादीं चतुर्थ विभावना ॥ ४९८ ॥
दुरति न कुचबिच कंचुकी, चुपरो मारौ मेत ।
कवि आंकनिके अथेलों, प्रगट दिखाई देत ४९९
( १६४ ) सतसई-सटीक ।
चोलीके भीतर तेरी छाती, इतर लगी श्वेत सारीमें नहीं
छिपती कविके अक्षरोंके अर्थकी भांति प्रत्यक्ष दिखाई देती
है । पूर्णोपमा और दृष्टांतालंकार ॥ ४९९ ॥
भई जु तनुछबि वसन मिलि, वरणिसके सुन नैन ।
अंग ओप आँगी डुरी, आँगी ओप दुरै न ॥ ५०० ॥
कपडेकी शोभासे मिलकर जो शरीरकी शोभा हुई उसे
कोई वर्णन नहीं करसक्ता अंगकी ज्योतिसे अँगिया छिपी है
परन्तु अँगियामें स्तन नहीं छिपते । मिलिता विभावना ५००
इति श्रीकविवर विहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
पंचम शतक पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
सौनजुहीसी जगमगै, अँग अँग यौवनजोति ।
सुरँगकुसुंभी कंचुकी, दुरँग देहद्युति होति ॥ ५०१ ॥
यौवनकी ज्योतिसे वह बाला पीत जुहीसी अंग अंगमें जग-
मगरहीहै, कंचुकी सुरंग कसूँभी रंगकी है, सो देहकी कान्ति
दो रंगयुक्त होती है लाल अंगमें देहदीतिका वर्णनहै ।
पूर्णोपमा ॥ ५०१ ॥
उर माणिककी उरवसी, निरखि घटत दृग दाग ।
छलकत बाहर भरि मनो, तियहियको अनुराग ॥
षट्शतक ६. ( १४९ )
हृदयपर लाल माणिक्यकी धुकधुकी देखकर नेत्रोंका दाग
घटताहै, मानों तियाके हृदयका अनुराग सम्पूर्ण भरकर बा-
हर छलकताहै, झलकत पाठमें झलकताहै, कहीं 'पियाहिय-
को अनुराग' पाठहै वहां ऐसा अर्थ करना मानों पियाके
हियेका अनुराग झलकताहै। वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५०२ ॥
त्रिवलीवर्णन ।
कर उठाय घूँघट करत, उसरत पट गुझरौट ।
सुखपोटैं लूटी ललन, लखि ललनाकी लोट ५०३॥
जिस समय उसने हाथ उठाकर घूँघट किया तब सलवट
खाकर वस्त्र हटा उससमय नायकने प्यारीकी त्रिवलीको देख-
कर सुखकी पोटें लूटीं। जातिअलंकार, गुझगोट-उलझन।
सिलोट-सिकुडन। लोट-लूटना ॥ ५०३ ॥
लहलहाति तनु तरुनई, लचि लगिलौं लफि जाय ।
लगैलांक लोयन भरी, लोयन लेत लगाय ॥५०४॥
प्यारीके शरीरमें तरुणाई शोभा देतीहै, और लचककर
छड़ीकी भांति लचजातीहै, कमर लावण्यभरी लगतीहै
परन्तु नेत्रोंको लगाय अर्थात् उसमें लपटती है, लफि-लफ-
कर लचककर । लग-पतली छड़ी । लांक लंक कमर । लो-
यन-लोन लावण्य। लोयन-लोचन। पूर्णोपमा यमक ॥५०४॥
लगी अनलगीसी जु विधि करी खर्ग कटि छीन ।
कियोमनौ वाही कमर, कुचि नितम्ब अतिपीन ॥
( १६६ ) सतसई-सटीक ।
विधाताने जो लगी अनलगोसी कटि अधिक क्षीण की है,
मानों उसी कसरसे नितम्ब और स्तन अतिपुष्ट कियेहैं लगी
अनलगी जुडी अनजुडी । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५०५ ॥
जंघावर्णन ।
जंघयुगल लोयन निरे, करे मनो विधि मैन ।
केलि तरुन दुखदेन ये, केलितरुन सुखदेन ५०६
मानों कामदेवरूपी ब्रह्माने दोनों जंघा निलौयन रोमरहित
बनाये हैं, यह कदली ( केले ) के वृक्षोंको दुःख देनेवाले हैं
और केलि ( रतिक्रीडामें ) तरुणपुरुषोंको सुख देनेवाले हैं ।
जमकालंकार । अथवा निरलोयन निरे आटेकी लोइयों-
सी हैं ॥ ५०६ ॥
रह्यो ढीठ ढाढस गहै, ससि हर गयो न शूर ।
मुड्यो न मन मुरवानमिलि, भौचूरन चपिचूर ५०७
शूरमन सुरखाओंसे मिलकर न मुडा, न सिहर गया ढीठ
होकर ढाढस गहेरहा अन्तमें उसके चूड़ोंसे दबकर चूर होगया
पादमूल और चूंडोंका वर्णन। सिहर-सहमना डरना. सुरधी-
लौटा । मुरवा-पादमूल पैरकी गाँठ। चूरन-चूड़ों से। चपि-
दबकर । सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ ५०७ ॥
एडीवर्णन ।
पांय महावर देनको, नायन बैठी आय ।
फिरि फिरि जानि महावरी, ऐंडी मीडत जाय ५०८
षट्शतक ६. ( १६७)
जब नाइन पाँवमें महावर देनेको आकर बैठी तब
वारम्बार महावरी जानकर एडीहीको मलने लगी, महावर्ग-
महावरकी गोली, नाइनको भ्रांति इस कारण हुई कि, वह
नई आई थी। भ्रांति अलंकार ॥ ५०८ ॥
कौहरसी एडीनकी, लाली देखि सुभाय ।
पाँय महावर देनको, आप भई वेपाय ॥ ५०९ ॥
लालफलके अर्जुन वृक्षकीसी स्वाभावि एडी देखकर पैरोंमें
महावर देनेको आई नाइन पाँवरहित होगई अपहाज (नि-
बुद्धि) वेपांय कहा । पूर्णोपमा ॥ ५०९ ॥
पायल वर्णन ।
कियघायलचितचायलगि, बाजिपायल तव पाँय ।
पुनिसुनिसुनिमुखमधुरधुनि. क्योंनलाल ललचाय
पायलने तेरे पांयस बजकर, चावसं लगकर चित्त घायल
किया फिर वारंवार मनोहर ध्वनि सुनकर ललन क्यों न लल-
चाय जहां हायल पाठहो वहां इसका अर्थ थकित करना
जानना और जब पायलका शब्द ऐसा है तो जाने मुखका
शब्द सुन कर लाल क्यों न ललचायेंगे ॥ ५१० ॥
मोहत अँगूठा पाँयको, अनवट जड़िन जड़ाय ।
जीतौ तरवनि द्युति सुदृढ़, पगे तरणि मनु पाँय ॥
- जडाऊ जड़ावका अनवट पाँवोंके अँगूठेमें शोभा देता है,
चतुर्थ भाग: दोहा ५५१ से ७१९ (भक्ति-भाव, समापन दोहे एवं शब्द-सूची)
( १६८ ) सतसई-सटीक ।
कानकी ढेरियाँने जो इसे अपनी अच्छी कांतिसे जीत लिया है,
इससे मानों हार कर सूरज तियाके पाँव पडरहा है ।
दृष्टान्तालंकार ॥ ५११ ॥
पगअंगुरीवर्णन ।
अरुण सरोरुहसे चरण, अँगुरी अति सुकुमार ।
चुवत सुरँग रँगसी मनो, चपिबिछियनके भार ५१२
चरण लाल कमलसे हैं उसमें अंगुरी अति कोमल हैं
मानों बिछुओंके बोझसे दबके अच्छे लालरंगसी चूती हैं ।
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५१२ ॥
गतिवर्णन ।
पगपगमगअगमनपरत, चरनअरुनद्युतिझूल ।
ठौर ठौर लखियतु उठै, दुपहरियासी फूल ५१३
मार्गमें पग पगपर आगे गिरतीहै, चरण लालकी कांति झूल
कर, ठौर २ उठे दुपहरियाके फूलसे दीखते हैं अर्थात् चर-
णोंसे चलनेके कारण दुपहरियाके फूलसे परछाईंसे लाल
लाल मार्गमें उठि आये हैं, व्यंग्यसे वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५१३ ॥
देहद्युतिवर्णन ।
तनु भूषण अंजन दृगनि, पगनि महाउररंग ।
नहिं शोभाको साजियत, कहिबेहीके अंग ५१४
षष्ठशतक ६. ( १६९ )
'तनुमें भूषण, नेत्रोंमें अंजन, चरणोंमें महावरका रंग इनसे
कुछ शोभा नहीं सजती यह तो शरीरमें कहनेहीको हैं
आशय यह कि, शरीरके अंगहीमें मिलजाते हैं इनकी शोभा
दिखाई नहीं देती । मीलितालंकार ॥ ५१४ ॥
मानहु विधि तनु अच्छछवि, स्वच्छ राखिवे काज।
दृग पग पोंछनको किये, भूषन पायनदाज ५१५॥
मानों शरीरकी अच्छी छवि स्वच्छ रखनेके निमित्त विधा-
ताने दृग और पगके पोंछनेको भूषणोंको पायन दाज किया है
जो फरशके आगे देहलीमें पगपोंछन होता है उसे पायनदान
कहते हैं । उत्प्रेक्षालंकार ॥ ५१५ ॥
सहज सेत पचतोरिया, पहरे अतिछवि होत ।
जलचादरके दीपज्यों, जगमगाति तनुजोत ५१६
स्वभावसेही श्वेत पचतोरिया वस्त्रकी धोती पहरकर
उसकी अति शोभा होतीहै जलकी चादरके बीचमें जैसे दीप-
ककी ज्योति जगमगातीहै तात्पर्य यह कि, जैसे पानीकी चाद-
रके पीछे दीपक बालरखनेसे वह चमकता है इसप्रकार
श्वेत साड़ीमें उसकी देह चमकतीहै । पूर्णोपमा ॥ ५१६ ॥
देखी मौनजुही फिरति, माँनजुहीमें अंग ।
दुति लपटन पट सेतमें, करत फिरौटी रंग ५१७
( १७० ) सतसई-सटीक ।
सोनजुही ( स्वर्णयूथी ) से अंगकी पीतजुही ( रूपवाला
अपनी कान्तिकी लपटोंसे श्वेत वस्त्र भी केशरिया रंग करते
हुए फिरते देखी । वनौटी-वनयष्टि । वनोटीरंग-कपासी वा
केशरियारंग । तद्गुणालंकार ॥ ५१७ ॥
वाहि लख लोयनु लगै, कौन जुवतिकी जोति ।
जाके तनुकी छाँहढिग, जोन्ह छाँहसी होति ५१८
उसके देखने पर फिर किस तरुणीकी ज्योति नेत्रोंमें लग स
कती है कि, जिसके शरीर की छायाके निकट चाँदनी छाया-
सी होजाती है । जोन्ह-चाँदनी । उत्प्रेक्षा ॥ ५१८ ॥
कहा कुसुम कहा कौमुदी, कितक आरसी जोति।
जाकी उजराई लखे, आंख ऊजरी होति ॥ ५१९ ॥
क्या फूल क्या चाँदनी और आरसीकी ज्योति कितनी है
जिसकी उजराई देखनेसे आँख ऊजरी होजाती हैं। प्रतीपालं-
कार ॥ ५१९ ॥
कहि लहि कौन सक दुरी, सोनजुहीमें जाय ।
तनुकी सहज सुवासना, देती जो न बताय ॥ ५२० ॥
कहो तो उस सोनजुहीमें जाकर छिपीहुईको कौन पासकता
था, जो उसके शरीरकी सहज सुवासना उसे न बतादेती ।
उन्मीलितालंकार ॥ ५२० ॥
षष्ठशतक ६. ( १७१ )
रहि न सक्यो कसुकरि रह्यो,वशकरि लीनो मार।
भेदि दुसार कियो हियो, तनुद्युति भेदी सार ५२१
रह नहीं सका बलकर हार गया कामदेवने अपने वशमें
करहीलिया छेदकर मेरे हियेको वारपार करदिया तनुकी
कान्तिने बरछीछेद दी । काव्यलिंग ॥ ५२१ ॥
कंचन तन धन वरन वर, रह्यो रंग मिलि रंग ।
जानीजात सुवासही, केशर लाई संग ॥ ५२२ ॥
उसके शरीरका वर्ण कंचनसे श्रेष्ठ है, उसमें रंगमें रंग
मिला है इस कारण अंगमें लगी हुई केशर सुगंधहीसे जानी-
जाती है, अर्थात् सुगंधके बिना केसर और उसके शरीरका
वर्ण एक प्रतीत होता है । उन्मीलिनालंकार ॥ ५२२ ॥
ह्वै कपूर मणिमय रही,मिलति न द्युति मुकतालि।
छिन छिन खरी विचक्षणी,लहत छानि तृणआलि
मोतियोंकी लड़ी शरीरकी कान्तिमें मिलकर कपूरसी
होकर मनमें रही सखी चतुरभी है, परन्तु खड़ी हुई छिन
छिनमें छप्परका तिनका लेती है; अर्थात् मोतीमाला
देख महामोहित होती है, चतुर सखी यह देख तृण
तोड़ती है ॥ ५२३ ॥
बाल छबीली तियनमें, बैठी आप छिपाय ।
( १७२ ) सतसई-सटीक ।
अरगटही फानूससी, परगट होत लखाय ॥५२४॥
वह बाला छबीली स्त्रियोंमें आप छिपकर बैठी परन्तु
घूँघटहीमें फानूससी प्रगट होकर दीखती है। पूर्णोपमा ५२४॥
करत मलिन आछी छविहि, हरतु जु सहजविकास
अंगराग अंगनि लज्यो, ज्यों आरसी उसास ५२५
यह तनुकी अच्छी छबिको मलीन करती है, स्वाभाविक
विकास ( चमक ) को हरण करता है, यह अंगोंमें लगा-
हुआ अंगराग ऐसा है, जैसे आरसीके स्वच्छ दर्पणपर, श्वा-
सकी भाप । पूर्णोपमा ॥ ५२५ ॥
पहिर न भूषण कनकके, कहि आवत यहि हेत ।
दर्पणकेसे मोरचे, देह दिखाई देत ॥ ५२६ ॥
सोनेके भूषण मत पहने यह बात कहनेमें आती है कि,
दर्पणकेसे मोरचे मेरी देह में दिखाई देते हैं, आशय यह
कि, तू यह मत जाने कि, मैं तेरा गहना उतरवाती
हूँ परन्तु यह तेरे शरीरके सामने मैले लगते हैं। विषमा-
लँकार ॥ ५२६ ॥
लीनेहू साहस सहस, कीने यतन हजार ।
लोयन लोयन सिंधु तन, पैरि न पावत पार ५२७
सहस्र साहस ( हिम्मत ) करके तथा सहस्र यत्न करके
भी शरीररूपी शोभा समुद्र पैर कर आंख पार नहीं पाती
षष्ठशतक ६. ( १७३ )
अर्थात् छबीलीके शोभारूप समुद्रमें तैरते हुए प्रीतमके नेत्र
थकगये । छेकानुप्रास जमकालंकार ॥ ५२७ ॥
दीठि न परत समान द्युति, कनक कनकसे गात।
भूषनकर करकस लगत, परसि छिपाने जात ५२८
कनकसे गात अर्थात् सुवर्णसे शरीरपर कंचन ( सुवर्ण )
दृष्टि तो नहीं पड़ता कारण कि, दोनोंकी समान कांति है
जब वे गहने हाथ में छूनेसे करकस लगते हैं, तब पहचाने
जाते हैं । उन्मीलितालंकार ॥ ५२८ ॥
अंग अंग नग जगमगत, दीपशिखासी देह ।
दिया बढ़ायेहू रहै, बड़ो उजेरो गेह ॥ ५२९ ॥
प्यारीके सब अंग अंग हीरे मोतीसे जगमगाते हैं, दीप-
ककी शिखाके समान सब देह है, दिया बढ़ाये परभी
घरमें बड़ा उजेला रहता है । अतद्गुण पूर्णोपमा ॥ ५२९ ॥
अंग अंग प्रतिबिम्बपर, दर्पणसे सब गात ।
दुहरे तिहरे चौहरे, भूषण जाने जात ॥ ५३० ॥
अंग २ का अंग २ में प्रतिबिम्ब पड़ता है, सब अङ्ग
दर्पणसे चमकते हैं, प्रतिबिम्बके कारण वे भूषण दुहरे तिहरे
चौहरे जाने जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३० ॥
अंग अंग छविकी लपटि, उपजति जात अछेह।
( १७४ ) सतसई-सटीक ।
खरी पातरीऊ तऊ, लगै भरीसी देह ॥ ५३१ ॥
प्यारीके अंग अंगसे छबिकी छटा निरन्तर उपजती
जाती है, यद्यपि अधिक पतली है, परन्तु शोभासे भरीसी
देह लगती है। लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३१ ॥
रंच न लखियत पहरि या, कंचनसे तनु बाल ।
कुँभिलानी जानीपरै, उर चपका माल ॥५३२॥
बालाके सोनेसे शरीरमें पहरी हुई तनकभी नहीं जानी
जाती, परन्तु हृदयपर मुरझानेसे चम्पेकी माला जानी जाती
है। उन्मीलित ॥ ५३२ ॥
त्यों त्यों प्यासेई रहत, ज्यों ज्यों पियत अघाय।
सगुन सलौने रूपको, नहिं चख तृषा बुझाय५३३
ज्यों ज्यों पेट भरकर पीते हैं त्यों त्यों प्यासेही रहतेहैं
गुणवान् सलौने रूपको देखकर नेत्रोंकी प्यास नहीं बुझती।
विशेषोक्ति ॥ ५३३ ॥
लिखनबैठ जाकी सबहि, गहि गहिग रबगरूर ।
भये न केते जगतके, चतुर चितेरे कूर ॥५३४॥
गर्व गरूर ग्रहण करके उसके चित्रको लिखनेको बैठे
जगतके कितने चतुर चित्रकार कूढ़ अर्थात् मूर्ख न होगये ।
विशेषोक्ति सबहि तस्वीर ॥ ५३४ ॥
षट्शतक ६. ( १७५ )
केसर केसर क्यों सकै, चंपक कितिक अनूप।
गातरूप लखि जात दुरि, जातरूपको रूप ५३५
केसर क्या बराबरी करसकती है, और चंपेकी भी क्या
शोभाहै; शरीरका रंग देखकर सोनेके रूपका रूपभी छिप-
जाताहै। प्रतीपालंकार ॥ ५३५ ॥
सोरठा।
तो तनु अधिक अनूप, रूप लगो सब जगतको ।
मो दृग लागे रूप, दृगनि लगी अति चटपटी ५३६
तेरा शरीर शोभाकी महिमा है, सब जगत्का रूप लगा
है, रूपसे मेरे नेत्र लगे हैं; इसीसे नेत्रोंको बड़ी चटपटी लगी
है। आधारमाला ॥ ५३६ ॥
सुकुमारता वर्णन ।
दोहा।
भूषणभार सँभारहीं, क्यों यह तनु सुकुमार ।
सूधो पाँयन धर परत, महि शोभाके भार ५३७
यह सुकुमार अंग भूषणका भार किसप्रकारसे संभाल
सकेंगे; कारणकि शोभाके भारसे सूधे पांव पृथ्वीमें नहीं धर
सकती अथवा स्त्रीकी शोभा कुच नितम्ब हैं उसके बोझसे
पृथ्वीमें सूधे पांव नहीं पडसकते। काकोक्ति अलंकार ५३७
( १७६ ) सतसई-सटीक ।
जनुकु धरत हर हिय धरैं, नाजुक कमला बाल ।
भजत भार भयभीत ह्वै, घन चन्दन वनमाल ५३८
मानों हरि कोमल लक्ष्मी बालांको हृदयमें धारण किये
हुए घना चन्दन और वनमाला धारण करते बोझसे डरते
भीतहो भजते हैं । आशय यह कि, प्यारी चन्दन वनमाला
देने लगी और प्रीतमको रोषकर चलता देख हृदयकी कोम-
लता प्रगट की ॥ ५३८ ॥
छाले परिवेके डरन, सकत न हाथ छुवाय ।
झझकति हिये गुलाबके, झबा झबावति पायँ ५३९
छाले पड़नेके डरसे हाथ नहीं छुवा सकती, हृदयमें
झझकती है गुलाब के झांवेसे पांव झवाती है । सम्बन्धा-
तिशयोक्ति ॥ ५३९ ॥
मैं बरजी कैबार तू, उत कत लेत करोंट ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, परिहैं गात खरोंट ॥५४०॥
अन्तरंग सखीका वचन, मैंने तुझे कईबार निषेध किया
तू उधरको करवट क्यों लेती है, गुलाबकी पँखुरी लगेगी
तो शरीरमें खुरेंट पड़ जायगी, अथवा फूल गेंद खेलते
समय सखीने कहा उस ओरकी करवटसे क्यों बचाव
करती है, गुलाबकी पँखुरीसे खुरेंट पड़ जायँगी । संबंधाति-
शयोक्ति ॥ ५४० ॥
षठशतक ६. ( १७० )
ज्यों कर त्यों चहुँटी चलै, ज्यों चहुँटी त्यों नारि।
छबिसों गतिसी लै चलति, चतुर कातनिहारि ॥
जैसे हाथ चलते हैं वैसेही चुटकी चलती हैं, जिस भाँति
चुटकी चलती हैं उसी भाँति गरदन हिलती है, शोभासे गति लै
चलती है इस प्रकार चतुर कातनेवाली "जातिअलं०" ५४१
गर्भिणी वर्णन ।
दृग थिरको हैं अधखुले, देह थको हैं ढार ।
सुरत सुखितसी देखियत, दुखित गर्भके भार ॥
नेत्र चञ्चल, अधखुले, देह थकित सुरतके अंतमें जैसे
सुखीसी दीखती है, उस प्रकार यह गर्भके भारसे दुःखित है
"जातिअलंकार" ॥ ५४२ ॥
गँवारी वर्णन ।
गोरी गदकारी परत, हँसत कपोलनि गाड ।
केसी लसत गँवारि वह, सुनकिरवाकी आड ॥
गोरी गुदगुदी है, हँसते हुए गालोंमें गड्ढे पड़ते हैं, सुन-
किरवाकी आड़ लगाये वह गँवारी कैसी शोभित होती है,
सुनकिरवा एक कीड़ा है, इसको सोनपटोला कहते हैं,
इसके पंख पन्नेके रंगके होते हैं "जाति अलंकार" ॥५४३॥
( १७८ ) सतसई-सटीक ।
प्रफुलाहार हिये लसै, सनकी बेंदी भाल ।
राखत खेत सरीखरी, खरे उरोजन बाल॥५४४॥
प्रफुला (कुडा) वृक्षके फूलोंका हार छातीपर शोभा देता
है माथेपर सनके फूलकी बेंदी लगाये है खरे उरोज स्तन-
वाली खडी खडी खेत रखाती है “श्लेषालंकार” ॥५४४॥
रतिमहिमा ।
चमक तमक हांसीसिसक, मसक झपटलिपटानि।
ए जहँरतिसोरतिमुकति, और मुकतिअतिहानि॥
चमकना तमकना हँसी सिसकारी मसकना झपटना और
लिपट जाना यह जहां रतिहै वेही रति मुक्त हैं और मुक्तिकी
तौ अतिहानि है ॥ ५४५ ॥
तनकौ झँठनि स्वादली, क्यों न बात परिजाय ।
तियमुखरति आरंभकी, नहिंजूंठियेमिठाय ५४६
तनकभी झूठसे स्वादवाली बात स्वादहीन हो जातीहै. प-
रन्तु प्रियाके मुखसे रतिके आरंभकी झूठी नहींही प्यारी ल-
गतीहै। अयुक्तायुक्त ॥ ५४६ ॥
जो न युक्ति पिय मिलनकी, धूरिमुकति मुँह दीन।
ज्योंलहियेसखिसजनतौं, धरकनरकहूकीन ५४७
षट्शतक ६. ( १७१ )
जो प्यारेके मिलनेकी युक्ति नहीं है तो मुक्तिके सुखमें धूरि
दी और जो सजनका संग मिले तो नरककाभी डर मैने त्याग
किया “अनुज्ञा” ॥ ५४७ ॥
प्रभातवर्णन ।
कुंजभवन तज भवनको, चलिये नन्दकिशोर ।
फूलत कली गुलाबकी, चटकाहट चहुँओर ५४८॥
हे नन्दकिशोर! अब कुञ्जभवनको त्यागकर भवनको च-
लिये कारण कि, गुलाबकी कली फूलती है उसकी चटकाहट
चारों ओर है अथवा चिड़ियोंकी चुचुहाटके समान कली
चटकती है तात्पर्य यह कि, प्रभात होगया “काकोक्ति” ५४८
हिंडोरा वर्णन ।
हेरि हिंडोरे गगनतें, परी परीसी टूटि ।
धरी धाय पियबीचहीं, करी खरी रस लूटि ५४९॥
हे सखी! देख यह हिंडोलारूपी आकाशसे परीसी टूटकर
ज्योंही गिरी कि, प्रीतमने दौड़कर बीचहीमें धारण किया
बड़ी खरी रसकी लूट की, अथवा प्यारेको हृदय लगाय
रस लूटकर खरी करी “यमकउपमेयलुप्ता” ॥ ५४९ ॥
बरजे दुनी हठ चढ़े, नाम कूँच न मँकाइ ।
टूटति कटि ड्रमचा मचक, लचकि रुचिजाय ॥
( १८० ) सतसई-सटीक ।
प्रीतमके बरजनेसे दूनी होड चढ़ती है हिंडोलेपर न सकुचती
है न डरती है दोनों ओरके बोझसे कमर लचकती है अर्थात्
नितम्ब और छातीके बोझसे लचक २ कर बचजाती है।
"तृतीय विभावना वीप्सालंकार" हुमची-झोटालेना॥५६०॥
जलविहारवर्णन ।
ले चुभकी चलिजात तित, जित जलकेलि अधीर।
कीजत केसरनीरसों, तित तित केसरनीर ५६१॥
प्रिया जलमें गोता मारकर जिधर तिधर चलीजाती है
और जलकेलिमें अधी होरही है, अपने शरीरमें लगे केश-
रके नीरसों जिधर तिधर केशरका नीर करती है "धर्मलु-
प्तालंकार" ॥ ५६१ ॥
विहँसति सकुचतिसी हिये, कुच आँचरबिच बाँह।
भीजे पट घरको चली, न्हाय सरोवरमाँह॥५६२॥
हृदयमें सकुचती और मनमें हँसतीसी छातीके अंचलके
बीच हाथ दिये सरोवरमें स्नानकर प्रिया भीजे वस्त्र घरको
चली "जातिअलंकार" ॥ ५६२ ॥
मुख पखार मुडहर भिजैं, शीशसजलकर छाय।
मोरि उँचै धुवैं नैन, नारि सरोवर न्हाय॥५६३॥
षष्ठशतक ६. ( १८१ )
मुख धोय जल हाथमें ले शिरको झुवाय बालोंको भिजोय
मुड़कर ऊँची होकर घुटनोंतक नवकर नारि सरोवरमें स्नान
करतीहै "जातिअलंकार" ॥ ५५३ ॥
छिरके नाह नवोढ दृग, करि पिचकी जलजोर ।
रोचनरँग लाली भई, विय तिय लोचनकोर ५५४॥
प्रीतमने जलके जोरसे नवोढाके नेत्र छिड़के, और
उसीसमय दूसरी सौतके नेत्रोंकि कोयोंमें गोरोचनके समान
लालीहुई "असंगति" ॥ ५५४ ॥
चलतललितश्रमस्वेदकण, कलितअरुणमुखऐन ।
वनविहारथाकी तरुनि, खरे थकाये नैन ॥५५५॥
चलनेसे जो मनोहर पसीनेके कण आगये उससे मुख-
रूपी स्थान लालीकी शोभायुक्त हुआ; और जब विहारकर
तरुणी थकित हुई तब उसके प्रीतमके नैन उसे देखते २ थ-
कित होगये । “ जाति० ” ॥ ५५५ ॥
बढतविकसिकुचकोररुचि, कढ़त गौरभुजमूल ।
मनु लुटगो लोटनु चढत, चूटत ऊँचे फूल ५५६॥
प्रियवचन सखीसे, जिस समय वह ऊँचा हाथकर फूल चोंट-
रही अर्थात् तोड़रहीथी उससमय खिलेहुए उसके कुचके
( १८२ ) सतसई-सटीक ।
कोरकी कांतिको बढते, तथा गोरी भुजाकी मूल और त्रिवली
देखकर मेरा मन लुटगया “ विभावना ” ॥ ५५६ ॥
अपने गुहिकर आपही, हिय पहिराइ लाल ।
नौलसिरी औरै चढ़ी, मौलसिरीकी माल ५५७॥
कृष्ण ने अपने हाथसे आपही गूँथकर प्यारीके हृदयमें
माला पहराई उस मौलसिरीकी मालासे बालाके नई
शोभा कुछ औरही चढ़ी “भेदकातिशयोक्ति छेकानुप्रास”
नौल-नवल ॥ ५५७ ॥
तूज्यौंउझकिझाँपतिवदन, झुकतिविहँसिसतराय।
त्यौंगुलालमुठीझुठी, झझकावतु पियजाय ५५८
तू ज्यों २ उझककर मुख ढकती है निहुड़ती और हँसती
है त्यों त्यों गुलालकी झूठी मूठीसे प्रीतम झझकाजाताहै
“पर्यायोक्ति स्वभावोक्ति” ॥ ५५८ ॥
पीठ दियेही नेक मुरि, कर घूँघटपट टारि ।
भरि गुलालकी मूठिसों, गई मूठसी मारि ५५९॥
वह पीठ फेरेही नेक मुरिकर हाथसे घूँघटपट टारकर
गुलालकी मूठी भरकर जादूकी मूठसी मारगई “ जातिअ-
लंकार यमक” ॥ ५५९ ॥