बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. - ( १६३ )
कन अँगुरी गोरी है नख लाल हैं छल्ला काला छबिदे-
रहा है यही क्रमसे गंगा सरस्वती और यमुना हैं, हे नेत्र !
यह त्रिवेणी सेयकर क्षणमें रतिरुपी मुक्ति होजाती है ।
रूपका० ॥ ४९६ ॥
चलन न पावत निगममग, जग उपजो अति त्रास
कुच उतंग गिरिवर गहो,मीना मैन मवास४९७॥
अब शास्त्रका मार्ग नहीं चलनेपाता जगतमें अति त्रास
उपज रहा हे कारण कि. कामरूपी भीलने स्तनरूपी ऊँचे
पर्वतोंकी कठिन ठौरमें अपना निवास कर रक्खा हे निगम-
मग-जिस मार्गकी खबर न पड़े । मवास-कठिन ठौर “रूपका-
लंकार” मेवाडके रहनेवाली जातके लोग जो लुटेरे हैं वह
मीना कहाते हैं वे वन पहाड़ोंकी कंदरामें रहते हैं ॥ ४९७॥
गाढ़े ठाढ़े कुच न ढिल, को पियहिय ठहराय ।
उकसों हँही तो हिये, दई सवत उकसाय ४९८॥
इन घने कठोर कुचोंके सामने ढिलकर पियाके सामने
कौन सौत ठहरेगी, तेरे स्तनोंने उकसनेही नायकके मनसे
सब सौतें हटादीं चतुर्थ विभावना ॥ ४९८ ॥
दुरति न कुचबिच कंचुकी, चुपरो मारौ मेत ।
कवि आंकनिके अथेलों, प्रगट दिखाई देत ४९९