बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्शतक ६. ( १६७)
जब नाइन पाँवमें महावर देनेको आकर बैठी तब
वारम्बार महावरी जानकर एडीहीको मलने लगी, महावर्ग-
महावरकी गोली, नाइनको भ्रांति इस कारण हुई कि, वह
नई आई थी। भ्रांति अलंकार ॥ ५०८ ॥
कौहरसी एडीनकी, लाली देखि सुभाय ।
पाँय महावर देनको, आप भई वेपाय ॥ ५०९ ॥
लालफलके अर्जुन वृक्षकीसी स्वाभावि एडी देखकर पैरोंमें
महावर देनेको आई नाइन पाँवरहित होगई अपहाज (नि-
बुद्धि) वेपांय कहा । पूर्णोपमा ॥ ५०९ ॥
पायल वर्णन ।
कियघायलचितचायलगि, बाजिपायल तव पाँय ।
पुनिसुनिसुनिमुखमधुरधुनि. क्योंनलाल ललचाय
पायलने तेरे पांयस बजकर, चावसं लगकर चित्त घायल
किया फिर वारंवार मनोहर ध्वनि सुनकर ललन क्यों न लल-
चाय जहां हायल पाठहो वहां इसका अर्थ थकित करना
जानना और जब पायलका शब्द ऐसा है तो जाने मुखका
शब्द सुन कर लाल क्यों न ललचायेंगे ॥ ५१० ॥
मोहत अँगूठा पाँयको, अनवट जड़िन जड़ाय ।
जीतौ तरवनि द्युति सुदृढ़, पगे तरणि मनु पाँय ॥
- जडाऊ जड़ावका अनवट पाँवोंके अँगूठेमें शोभा देता है,