बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) सतसई-सटीक ।
विधाताने जो लगी अनलगोसी कटि अधिक क्षीण की है,
मानों उसी कसरसे नितम्ब और स्तन अतिपुष्ट कियेहैं लगी
अनलगी जुडी अनजुडी । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५०५ ॥
जंघावर्णन ।
जंघयुगल लोयन निरे, करे मनो विधि मैन ।
केलि तरुन दुखदेन ये, केलितरुन सुखदेन ५०६
मानों कामदेवरूपी ब्रह्माने दोनों जंघा निलौयन रोमरहित
बनाये हैं, यह कदली ( केले ) के वृक्षोंको दुःख देनेवाले हैं
और केलि ( रतिक्रीडामें ) तरुणपुरुषोंको सुख देनेवाले हैं ।
जमकालंकार । अथवा निरलोयन निरे आटेकी लोइयों-
सी हैं ॥ ५०६ ॥
रह्यो ढीठ ढाढस गहै, ससि हर गयो न शूर ।
मुड्यो न मन मुरवानमिलि, भौचूरन चपिचूर ५०७
शूरमन सुरखाओंसे मिलकर न मुडा, न सिहर गया ढीठ
होकर ढाढस गहेरहा अन्तमें उसके चूड़ोंसे दबकर चूर होगया
पादमूल और चूंडोंका वर्णन। सिहर-सहमना डरना. सुरधी-
लौटा । मुरवा-पादमूल पैरकी गाँठ। चूरन-चूड़ों से। चपि-
दबकर । सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ ५०७ ॥
एडीवर्णन ।
पांय महावर देनको, नायन बैठी आय ।
फिरि फिरि जानि महावरी, ऐंडी मीडत जाय ५०८