बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठशतक ६. ( १७१ )
रहि न सक्यो कसुकरि रह्यो,वशकरि लीनो मार।
भेदि दुसार कियो हियो, तनुद्युति भेदी सार ५२१
रह नहीं सका बलकर हार गया कामदेवने अपने वशमें
करहीलिया छेदकर मेरे हियेको वारपार करदिया तनुकी
कान्तिने बरछीछेद दी । काव्यलिंग ॥ ५२१ ॥
कंचन तन धन वरन वर, रह्यो रंग मिलि रंग ।
जानीजात सुवासही, केशर लाई संग ॥ ५२२ ॥
उसके शरीरका वर्ण कंचनसे श्रेष्ठ है, उसमें रंगमें रंग
मिला है इस कारण अंगमें लगी हुई केशर सुगंधहीसे जानी-
जाती है, अर्थात् सुगंधके बिना केसर और उसके शरीरका
वर्ण एक प्रतीत होता है । उन्मीलिनालंकार ॥ ५२२ ॥
ह्वै कपूर मणिमय रही,मिलति न द्युति मुकतालि।
छिन छिन खरी विचक्षणी,लहत छानि तृणआलि
मोतियोंकी लड़ी शरीरकी कान्तिमें मिलकर कपूरसी
होकर मनमें रही सखी चतुरभी है, परन्तु खड़ी हुई छिन
छिनमें छप्परका तिनका लेती है; अर्थात् मोतीमाला
देख महामोहित होती है, चतुर सखी यह देख तृण
तोड़ती है ॥ ५२३ ॥
बाल छबीली तियनमें, बैठी आप छिपाय ।