बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६४ ) सतसई-सटीक ।
चोलीके भीतर तेरी छाती, इतर लगी श्वेत सारीमें नहीं
छिपती कविके अक्षरोंके अर्थकी भांति प्रत्यक्ष दिखाई देती
है । पूर्णोपमा और दृष्टांतालंकार ॥ ४९९ ॥
भई जु तनुछबि वसन मिलि, वरणिसके सुन नैन ।
अंग ओप आँगी डुरी, आँगी ओप दुरै न ॥ ५०० ॥
कपडेकी शोभासे मिलकर जो शरीरकी शोभा हुई उसे
कोई वर्णन नहीं करसक्ता अंगकी ज्योतिसे अँगिया छिपी है
परन्तु अँगियामें स्तन नहीं छिपते । मिलिता विभावना ५००
इति श्रीकविवर विहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
पंचम शतक पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
सौनजुहीसी जगमगै, अँग अँग यौवनजोति ।
सुरँगकुसुंभी कंचुकी, दुरँग देहद्युति होति ॥ ५०१ ॥
यौवनकी ज्योतिसे वह बाला पीत जुहीसी अंग अंगमें जग-
मगरहीहै, कंचुकी सुरंग कसूँभी रंगकी है, सो देहकी कान्ति
दो रंगयुक्त होती है लाल अंगमें देहदीतिका वर्णनहै ।
पूर्णोपमा ॥ ५०१ ॥
उर माणिककी उरवसी, निरखि घटत दृग दाग ।
छलकत बाहर भरि मनो, तियहियको अनुराग ॥