बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६८ ) सतसई-सटीक ।
कानकी ढेरियाँने जो इसे अपनी अच्छी कांतिसे जीत लिया है,
इससे मानों हार कर सूरज तियाके पाँव पडरहा है ।
दृष्टान्तालंकार ॥ ५११ ॥
पगअंगुरीवर्णन ।
अरुण सरोरुहसे चरण, अँगुरी अति सुकुमार ।
चुवत सुरँग रँगसी मनो, चपिबिछियनके भार ५१२
चरण लाल कमलसे हैं उसमें अंगुरी अति कोमल हैं
मानों बिछुओंके बोझसे दबके अच्छे लालरंगसी चूती हैं ।
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५१२ ॥
गतिवर्णन ।
पगपगमगअगमनपरत, चरनअरुनद्युतिझूल ।
ठौर ठौर लखियतु उठै, दुपहरियासी फूल ५१३
मार्गमें पग पगपर आगे गिरतीहै, चरण लालकी कांति झूल
कर, ठौर २ उठे दुपहरियाके फूलसे दीखते हैं अर्थात् चर-
णोंसे चलनेके कारण दुपहरियाके फूलसे परछाईंसे लाल
लाल मार्गमें उठि आये हैं, व्यंग्यसे वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५१३ ॥
देहद्युतिवर्णन ।
तनु भूषण अंजन दृगनि, पगनि महाउररंग ।
नहिं शोभाको साजियत, कहिबेहीके अंग ५१४