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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 222

षष्ठशतक ६. ( १६९ )
'तनुमें भूषण, नेत्रोंमें अंजन, चरणोंमें महावरका रंग इनसे
कुछ शोभा नहीं सजती यह तो शरीरमें कहनेहीको हैं
आशय यह कि, शरीरके अंगहीमें मिलजाते हैं इनकी शोभा
दिखाई नहीं देती । मीलितालंकार ॥ ५१४ ॥
मानहु विधि तनु अच्छछवि, स्वच्छ राखिवे काज।
दृग पग पोंछनको किये, भूषन पायनदाज ५१५॥
मानों शरीरकी अच्छी छवि स्वच्छ रखनेके निमित्त विधा-
ताने दृग और पगके पोंछनेको भूषणोंको पायन दाज किया है
जो फरशके आगे देहलीमें पगपोंछन होता है उसे पायनदान
कहते हैं । उत्प्रेक्षालंकार ॥ ५१५ ॥
सहज सेत पचतोरिया, पहरे अतिछवि होत ।
जलचादरके दीपज्यों, जगमगाति तनुजोत ५१६
स्वभावसेही श्वेत पचतोरिया वस्त्रकी धोती पहरकर
उसकी अति शोभा होतीहै जलकी चादरके बीचमें जैसे दीप-
ककी ज्योति जगमगातीहै तात्पर्य यह कि, जैसे पानीकी चाद-
रके पीछे दीपक बालरखनेसे वह चमकता है इसप्रकार
श्वेत साड़ीमें उसकी देह चमकतीहै । पूर्णोपमा ॥ ५१६ ॥
देखी मौनजुही फिरति, माँनजुहीमें अंग ।
दुति लपटन पट सेतमें, करत फिरौटी रंग ५१७