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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 218

षट्शतक ६. ( १४९ )
हृदयपर लाल माणिक्यकी धुकधुकी देखकर नेत्रोंका दाग
घटताहै, मानों तियाके हृदयका अनुराग सम्पूर्ण भरकर बा-
हर छलकताहै, झलकत पाठमें झलकताहै, कहीं 'पियाहिय-
को अनुराग' पाठहै वहां ऐसा अर्थ करना मानों पियाके
हियेका अनुराग झलकताहै। वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५०२ ॥
त्रिवलीवर्णन ।
कर उठाय घूँघट करत, उसरत पट गुझरौट ।
सुखपोटैं लूटी ललन, लखि ललनाकी लोट ५०३॥
जिस समय उसने हाथ उठाकर घूँघट किया तब सलवट
खाकर वस्त्र हटा उससमय नायकने प्यारीकी त्रिवलीको देख-
कर सुखकी पोटें लूटीं। जातिअलंकार, गुझगोट-उलझन।
सिलोट-सिकुडन। लोट-लूटना ॥ ५०३ ॥
लहलहाति तनु तरुनई, लचि लगिलौं लफि जाय ।
लगैलांक लोयन भरी, लोयन लेत लगाय ॥५०४॥
प्यारीके शरीरमें तरुणाई शोभा देतीहै, और लचककर
छड़ीकी भांति लचजातीहै, कमर लावण्यभरी लगतीहै
परन्तु नेत्रोंको लगाय अर्थात् उसमें लपटती है, लफि-लफ-
कर लचककर । लग-पतली छड़ी । लांक लंक कमर । लो-
यन-लोन लावण्य। लोयन-लोचन। पूर्णोपमा यमक ॥५०४॥
लगी अनलगीसी जु विधि करी खर्ग कटि छीन ।
कियोमनौ वाही कमर, कुचि नितम्ब अतिपीन ॥