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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

( १७० ) सतसई-सटीक ।
सोनजुही ( स्वर्णयूथी ) से अंगकी पीतजुही ( रूपवाला
अपनी कान्तिकी लपटोंसे श्वेत वस्त्र भी केशरिया रंग करते
हुए फिरते देखी । वनौटी-वनयष्टि । वनोटीरंग-कपासी वा
केशरियारंग । तद्गुणालंकार ॥ ५१७ ॥
वाहि लख लोयनु लगै, कौन जुवतिकी जोति ।
जाके तनुकी छाँहढिग, जोन्ह छाँहसी होति ५१८
उसके देखने पर फिर किस तरुणीकी ज्योति नेत्रोंमें लग स
कती है कि, जिसके शरीर की छायाके निकट चाँदनी छाया-
सी होजाती है । जोन्ह-चाँदनी । उत्प्रेक्षा ॥ ५१८ ॥
कहा कुसुम कहा कौमुदी, कितक आरसी जोति।
जाकी उजराई लखे, आंख ऊजरी होति ॥ ५१९ ॥
क्या फूल क्या चाँदनी और आरसीकी ज्योति कितनी है
जिसकी उजराई देखनेसे आँख ऊजरी होजाती हैं। प्रतीपालं-
कार ॥ ५१९ ॥
कहि लहि कौन सक दुरी, सोनजुहीमें जाय ।
तनुकी सहज सुवासना, देती जो न बताय ॥ ५२० ॥
कहो तो उस सोनजुहीमें जाकर छिपीहुईको कौन पासकता
था, जो उसके शरीरकी सहज सुवासना उसे न बतादेती ।
उन्मीलितालंकार ॥ ५२० ॥