बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पंचमशतक ५. (१७५)
मानहुँ सुरसरिता विमल, जल उछरत युग मीन॥
झीने घूँघटके वस्त्रमें चञ्चल नेत्र चमचमाते हैं मानों
गंगाजीके उज्ज्वल जलमें दो मछली उछलती हैं। वस्तु उत्प्रे-
क्षा। वस्त्र श्वेत ॥ ४६८ ॥
वारों बलि तो दृगनिपर, अलि खंजन मृगमीन ।
आधी दीठि चितौन जेहि, किये लाल आधीन ॥
तेरे इन नेत्रोंपर मैं भौंरे ममोले मृग और मीनको भी वार-
डारूं जो तैंने आधी दृष्टिसे देखतेही कृष्णको अपने आधीन
करलिया । व्यतिरेकालंकार ॥ ४६९ ॥
जे तब हुती दिखादिखी, भई अमी दृक अंक ।
दगै तिरीछी दीठि अब, ह्वै बीछीको डंक ॥४७०॥
जो तब देखा देखी थी वह निश्चयही अमृतरूप हुई थी
अब तो वह तिरछी दृष्टि बिच्छूका डंक होकर दागती (डस-
ती) है । पर्याय अलंकार ॥ ४७० ॥
बेधक अनियारे नयन, बेधत करत निषेध ।
बरबस बेधत मो हियो, नौ नासाको बेध ॥४७१॥
यह तेरे तीक्ष्ण नेत्र बेध डालने में इन्हें रोकनेका निषेध न
कर तेरी नासाका बेधही बरबस मेरा मन बेध डालता है ।
चतुर्थ विभावना ॥ ४७१ ॥
( १५६ ) सतसई-सटीक ।
जटित नीलमणि जगमगत, सींक सुहाई नाक ।
मनो अली चम्पककली, बसि रस लेत निशंक ।
नीलमणिकी जड़ी हुई झलकी नाकपर शोभा देती है
मानों भौंरा चम्पेकी कलीमें निवास कर रस लेता है। वस्तु-
उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४७२ ॥
यदपि लौंग ललितौ तऊ, पहिर न तू इक आँक।
सदा शंक बढिये रहै, यहै चढेसी नाक ॥ ४७३ ॥
यद्यपि लौंग सुन्दर है, तो भी तू मत पहरे, इसमें निश्चय
मान यह तेरी चढीसी नाक देखकर सदा शंका बढतीही
रहती है अर्थात् नाक चढनेसे मानका भ्रम होता है। व्याज-
स्तुति ॥ ४७३ ॥
इन दोई मोती सुगथ, तू नथ गरब निशांक ।
जिह पहरत जग दृग ग्रसत, लसत हंसत सीनाँक॥
इन दोई मोतीके अच्छेप्रकारसे गुथनेसे हे नथ! तू निःशंक
गर्वकर, जिसके पहरनेसे जगत्के नेत्र ग्रसकर नासिका हँसती-
सी विदित होतीहै ! काव्यलिंग ॥४७४॥
बेसरमोती धनि तुही, को पूछै कुल जाति ।
पीबोकर तियओठको, रसनिधरक दिनराति४७५
पंचमशतक ५. ( १५७ )
हे बेसरके मोती ! तू ही धन्यहै ऐसे विषयमें कोई कुल
जाति नहीं पूछता तू। प्यारीके ओठका रस रातदिन पीता रह।
अन्योक्ति ॥ ४७५ ॥
वरन वास सुकुमारता, सबविधि रही समाय ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, गात न जानी जाय ४७६॥
वरन ( रंग ) सुगंधि सुकुमारता सब प्रकार उसमें समा-
रहीहै जो गुलाबकी पंखुरी भी शरीरसे लगी हुई नहीं जानी
जाती गुलाब और शरीरका रंग एकसाहै ॥ ४७६ ॥
लौने मुख दीठि न लगै, यों कहि दीनों ईठि ।
दूनी ह्वै लागन लगी, दिये डिठौना दीठि ४७७॥
इस सलोने मुखपर किसीकी नजर न लगे यों कह सखी-
ने स्याही की बिन्दी लगादी, दीठ डिठौनाके लगातेही दूनी
हो लगने लगी । विषमालंकार ॥ ४७७ ॥
पिय तियसों हँसिकै कह्यो, लखि डिठौना दीन ।
चन्द्रमुखी मुखचंद्र तें, भलो चन्द्रसम कीन ४७८
प्यारीको डिठौना स्याहीकी बिन्दी लगाये देख पियाने
तियासे हँसकर कहा, हेचन्द्रवदनि ! तुमने अपना मुखचंद्र
अच्छा चन्द्रमाके समान किया अर्थात प्रथम निर्मल चन्द्र-
( १५८ ) सतसई-सटीक ।
माके समान और अब श्यामतायुक्त चन्द्रमाके समान किया।
व्यतिरेक ॥ ४७८ ॥
लसत सेतसारी ढक्यो, तरल तरौना कान ।
परो मनो सुरसरिसलिल, जनु रविबिंबमहान ॥
सफेद सारीसे ढकी चमकती ढेरी नायकाके कानमें ऐसे
शोभा देतीहै, मानों प्रभात काल गंगाजलमें सूर्यकी परछाई
पड़ीहो । वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ४७९ ॥
लसै मुरासा तियश्रवन, यों मुकतानि दुति पाय ।
मानों परस कपोलके, रहे स्वेदकण छाय ४८०॥
प्यारीके कानोंमें मोतियोंकी कान्तिको पाकर तरकी
ऐसी शोभा देती हैं जैसे कपोलोंके छूनेसे ( स्वेदकण )
पसीनेके कण छारहेहैं। हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४८० ॥
शालतहै नटसालसी, कैहू निकसति नाहिं ॥
मनमथने जानो कसी, खुबी खुबी मनमाहिं ४८१
टूटे कांटेके समान खटकतीहै किसीप्रकार नहीं निक-
लती कामदेवके भालेकी नोकके समान भली प्रकारसे मेरे
मनमें खुबी चुभीहै। पूर्णोपमा ॥ ४८१ ॥
झीने पटमें झुलमिली, झलकत ओप अपार ।
सुरतरुकी मनु सिंधुमें, लसति सपल्लव डार४८२
पंचमशतक ५. ( १५९ )
महीन वस्त्रमें (झुलमुली) कानके पत्तोंकी अपार ज्योति च-
मकतीहै मानों सागरमें कल्पवृक्षकी डार पत्तों सहित स्थित
हो । उत्प्रेक्षा ॥ ४८२ ॥
नेक हँसोही बान तजि,लख्योपरत मुख नीठि ।
चौका चमकनि चौंधमें,परत चौंधसी दीठि॥४८३
सखी तू नेक हँसनेका स्वभाव छोड़दे तेरा मुख नजरभर
कर देखाजायहै, दांतके चौककी चमकसे हमारी दृष्टि चौंधा-
ईसी होजातीहै । काव्यलिंग ॥ ४८३ ॥
कुचगिरिचढिअतिथकितहै,चलीदीठमुख चाड॥
फिरि न टरी परियरही,परी चिबुकके गाड ॥४८४
मेरी दृष्टि कुचरूपी पर्वत पर चढ़ फिर बहुत हारके मुख
की सुन्दरताकी ओर चली, परन्तु फिर वहांसे आगे न चली
ठोडीके गर्तमें पडी पडीही रही। काव्यलिंग ॥ ४८४ ॥
डारे ठोडी गाड गहि,नैनबटोही मार ।
चिलकचौंधमें रूपठग,हांसीफांसी डार ॥४८५॥
मुखकी ज्योतिरूप प्रकटचांदनीमें सुन्दरतारूप ठगने
हाँसीकी फांसी डालकर कितने नेत्ररूप बटोही मारकर ठोडीके
गढेमें डालदियेहैं। सावयवरूपक ॥ ४८५ ॥
तौ लगि या मन जो गई,सो गति कही न जानि।
( १६० ) सतसई-सटीक ।
ठोडी गाड गड्योतऊ, उडोरहत दिनरात ४८६
जो तुझे देखकर मेरे मनने जो पकडीहै सो गति कही नहीं
जाती है, यद्यपि ठोडीके गर्तमें पडाहै तथापि दिनरात उड
ताही रहताहै यदि कहो दिनरात उड़नेसे उड़नेकी पुष्टाई नहीं
है तो इसका भाव यह कि,कहीं हाथ चिबुकको स्पर्श न करे
यही सोच रहताहै ॥ ४८६ ॥
ललित श्याम लीला ललन,चढीचिबुकछबि दून।
मधु छाक्यो मधुकर पर्यो,मनो गुलाबप्रसून४८७
हे कृष्ण ! सुन्दर श्याम गुदानेसे उसकी चिबुककी शो-
भा दूनी बढगई है, जैसे मकरन्दसे मत्त हो भौंरा गुलाबके फूल-
पर टूटपड़ा हो। उत्प्रेक्षा मुखवर्णन ॥ ४८७ ॥
सूर उदितहू मुदित मन,मुख सुखमाकी ओर ।
चिते रहत चहुँओरते, निहचल चखनिचकोर ॥
सूर्यके उदय होनेसेभी प्रसन्न मन होकर मुखकी शोभाकी
ओर चारों ओर निश्चल हुए चकोरोंके नेत्र तुझे देखतेही
रहते हैं। भ्रांति मुखकी सुखमा सब ओर है ॥ ४८८ ॥
पत्राही तिथि पाइये, वा घरके चहुँपास।
नितप्रति पून्योही रहै, आनन ओप उजास ४८९॥
पंचमशतक ५. ( १६१ )
प्यारीके घरके चारों ओर पत्रेहींसें तिथिका पता लगता
है कारण कि, उसके मुखके उजालेसे नित्य प्रति पूनोहीं रहती
है। परिसंख्यालंकार ॥ ४८९ ॥
छिप्यो छबीलो मुख लसै, नीले अंचल चीर ।
मनो कलानिधि झलमले, कालिन्दीके नीर ४९०
नीले अंचलमें छिपा हुआ प्यारीका छबीला मुख ऐसे
शोभा देता है, मानों नीले अंचलको चीरकर चन्द्रमा का-
लिन्दी यमुनाके नीरमें शोभा देता है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९० ॥
जरीकोर गोरे वदन, खरी बढ़ी छवि देख ।
लसत मनो बिजुरी किये, शारदशशि परिवेख ॥
जरीकी किनारी गोरे मुखपर अति बढ़ीहुई शोभा देती
है मानों शरदके चन्द्रमापर बिजली मण्डलाकार किये शो-
भित है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९१ ॥
ग्रीवावर्णन ।
खरी लसत गोरे गरे, धसति पानकी पीक ।
मनो गुलूबंद लालकी, लाल लाल दुतिलीक ४९२
गोरे गलेमें अति धसती हुई पानकी पीक अति शोभा देती
है मानों लालोंका गुलूबंद पहरे है, हे कृष्ण । इसप्रकार
लाटछकीर दीखती है। हेतु उत्प्रेक्षा ॥ ४९२ ॥
११
( १६२ ) सतसई-सटीक ।
पहरतही गोरे गरे, यों दौरी द्युति लाल ।
मनो परसि पुलकित भई, मौलसिरीकी माल ॥
हे कृष्ण ! गोरे गलेमें पहरतेही इसप्रकारसे शोभा दौडी
मानों छूनेसेही मौलसिरीकी माला रोमाञ्चित हुई हो तात्प-
र्य यह कि, प्यारीने प्यारेकी दी हुई वह माला गोरे गलेमें
पहरी उससे यों उसकी छबि बढ़ी मानों लालके हाथसे
स्पर्श हुई हो । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४९३ ॥
बड़े कहावत आपहू, गरुए गोपीनाथ ।
तौ बदिहौं जो राखिहो, हाथनि लखि मन हाथ ॥
हे गोपीनाथकृष्ण! आपभी बड़े गौरवके कहाते हो परन्तु
जो उसके हाथको देखकर मन अपने हाथमें रक्खोगे तो मैं
जानूंगी । संभावना ॥ ४९४ ॥
वेई कर व्यौरन वहैं, व्यौरो कौन विचार ।
जिनहीं उरझो मो हियो, तिनहीं सुरझेबार ४९५॥
हे सखी ! वेही हाथ हैं और वही झाडना वा सुलझानाहै भेद
किस विचारसे है जिनमें मेरा हृदय उलझा है उन्हींसे बाल
सुलझे । पंचम विभावना ॥ ४९५ ॥
गोरी छिगुनी नख अरुन, छलास्याम छबिदेइ ।
लहति मुकति रति क्षणिक यह, नैन त्रिवेनीसेइ ॥
पंचमशतक ५. - ( १६३ )
कन अँगुरी गोरी है नख लाल हैं छल्ला काला छबिदे-
रहा है यही क्रमसे गंगा सरस्वती और यमुना हैं, हे नेत्र !
यह त्रिवेणी सेयकर क्षणमें रतिरुपी मुक्ति होजाती है ।
रूपका० ॥ ४९६ ॥
चलन न पावत निगममग, जग उपजो अति त्रास
कुच उतंग गिरिवर गहो,मीना मैन मवास४९७॥
अब शास्त्रका मार्ग नहीं चलनेपाता जगतमें अति त्रास
उपज रहा हे कारण कि. कामरूपी भीलने स्तनरूपी ऊँचे
पर्वतोंकी कठिन ठौरमें अपना निवास कर रक्खा हे निगम-
मग-जिस मार्गकी खबर न पड़े । मवास-कठिन ठौर “रूपका-
लंकार” मेवाडके रहनेवाली जातके लोग जो लुटेरे हैं वह
मीना कहाते हैं वे वन पहाड़ोंकी कंदरामें रहते हैं ॥ ४९७॥
गाढ़े ठाढ़े कुच न ढिल, को पियहिय ठहराय ।
उकसों हँही तो हिये, दई सवत उकसाय ४९८॥
इन घने कठोर कुचोंके सामने ढिलकर पियाके सामने
कौन सौत ठहरेगी, तेरे स्तनोंने उकसनेही नायकके मनसे
सब सौतें हटादीं चतुर्थ विभावना ॥ ४९८ ॥
दुरति न कुचबिच कंचुकी, चुपरो मारौ मेत ।
कवि आंकनिके अथेलों, प्रगट दिखाई देत ४९९
( १६४ ) सतसई-सटीक ।
चोलीके भीतर तेरी छाती, इतर लगी श्वेत सारीमें नहीं
छिपती कविके अक्षरोंके अर्थकी भांति प्रत्यक्ष दिखाई देती
है । पूर्णोपमा और दृष्टांतालंकार ॥ ४९९ ॥
भई जु तनुछबि वसन मिलि, वरणिसके सुन नैन ।
अंग ओप आँगी डुरी, आँगी ओप दुरै न ॥ ५०० ॥
कपडेकी शोभासे मिलकर जो शरीरकी शोभा हुई उसे
कोई वर्णन नहीं करसक्ता अंगकी ज्योतिसे अँगिया छिपी है
परन्तु अँगियामें स्तन नहीं छिपते । मिलिता विभावना ५००
इति श्रीकविवर विहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
पंचम शतक पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
सौनजुहीसी जगमगै, अँग अँग यौवनजोति ।
सुरँगकुसुंभी कंचुकी, दुरँग देहद्युति होति ॥ ५०१ ॥
यौवनकी ज्योतिसे वह बाला पीत जुहीसी अंग अंगमें जग-
मगरहीहै, कंचुकी सुरंग कसूँभी रंगकी है, सो देहकी कान्ति
दो रंगयुक्त होती है लाल अंगमें देहदीतिका वर्णनहै ।
पूर्णोपमा ॥ ५०१ ॥
उर माणिककी उरवसी, निरखि घटत दृग दाग ।
छलकत बाहर भरि मनो, तियहियको अनुराग ॥
षट्शतक ६. ( १४९ )
हृदयपर लाल माणिक्यकी धुकधुकी देखकर नेत्रोंका दाग
घटताहै, मानों तियाके हृदयका अनुराग सम्पूर्ण भरकर बा-
हर छलकताहै, झलकत पाठमें झलकताहै, कहीं 'पियाहिय-
को अनुराग' पाठहै वहां ऐसा अर्थ करना मानों पियाके
हियेका अनुराग झलकताहै। वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५०२ ॥
त्रिवलीवर्णन ।
कर उठाय घूँघट करत, उसरत पट गुझरौट ।
सुखपोटैं लूटी ललन, लखि ललनाकी लोट ५०३॥
जिस समय उसने हाथ उठाकर घूँघट किया तब सलवट
खाकर वस्त्र हटा उससमय नायकने प्यारीकी त्रिवलीको देख-
कर सुखकी पोटें लूटीं। जातिअलंकार, गुझगोट-उलझन।
सिलोट-सिकुडन। लोट-लूटना ॥ ५०३ ॥
लहलहाति तनु तरुनई, लचि लगिलौं लफि जाय ।
लगैलांक लोयन भरी, लोयन लेत लगाय ॥५०४॥
प्यारीके शरीरमें तरुणाई शोभा देतीहै, और लचककर
छड़ीकी भांति लचजातीहै, कमर लावण्यभरी लगतीहै
परन्तु नेत्रोंको लगाय अर्थात् उसमें लपटती है, लफि-लफ-
कर लचककर । लग-पतली छड़ी । लांक लंक कमर । लो-
यन-लोन लावण्य। लोयन-लोचन। पूर्णोपमा यमक ॥५०४॥
लगी अनलगीसी जु विधि करी खर्ग कटि छीन ।
कियोमनौ वाही कमर, कुचि नितम्ब अतिपीन ॥
( १६६ ) सतसई-सटीक ।
विधाताने जो लगी अनलगोसी कटि अधिक क्षीण की है,
मानों उसी कसरसे नितम्ब और स्तन अतिपुष्ट कियेहैं लगी
अनलगी जुडी अनजुडी । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५०५ ॥
जंघावर्णन ।
जंघयुगल लोयन निरे, करे मनो विधि मैन ।
केलि तरुन दुखदेन ये, केलितरुन सुखदेन ५०६
मानों कामदेवरूपी ब्रह्माने दोनों जंघा निलौयन रोमरहित
बनाये हैं, यह कदली ( केले ) के वृक्षोंको दुःख देनेवाले हैं
और केलि ( रतिक्रीडामें ) तरुणपुरुषोंको सुख देनेवाले हैं ।
जमकालंकार । अथवा निरलोयन निरे आटेकी लोइयों-
सी हैं ॥ ५०६ ॥
रह्यो ढीठ ढाढस गहै, ससि हर गयो न शूर ।
मुड्यो न मन मुरवानमिलि, भौचूरन चपिचूर ५०७
शूरमन सुरखाओंसे मिलकर न मुडा, न सिहर गया ढीठ
होकर ढाढस गहेरहा अन्तमें उसके चूड़ोंसे दबकर चूर होगया
पादमूल और चूंडोंका वर्णन। सिहर-सहमना डरना. सुरधी-
लौटा । मुरवा-पादमूल पैरकी गाँठ। चूरन-चूड़ों से। चपि-
दबकर । सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ ५०७ ॥
एडीवर्णन ।
पांय महावर देनको, नायन बैठी आय ।
फिरि फिरि जानि महावरी, ऐंडी मीडत जाय ५०८
षट्शतक ६. ( १६७)
जब नाइन पाँवमें महावर देनेको आकर बैठी तब
वारम्बार महावरी जानकर एडीहीको मलने लगी, महावर्ग-
महावरकी गोली, नाइनको भ्रांति इस कारण हुई कि, वह
नई आई थी। भ्रांति अलंकार ॥ ५०८ ॥
कौहरसी एडीनकी, लाली देखि सुभाय ।
पाँय महावर देनको, आप भई वेपाय ॥ ५०९ ॥
लालफलके अर्जुन वृक्षकीसी स्वाभावि एडी देखकर पैरोंमें
महावर देनेको आई नाइन पाँवरहित होगई अपहाज (नि-
बुद्धि) वेपांय कहा । पूर्णोपमा ॥ ५०९ ॥
पायल वर्णन ।
कियघायलचितचायलगि, बाजिपायल तव पाँय ।
पुनिसुनिसुनिमुखमधुरधुनि. क्योंनलाल ललचाय
पायलने तेरे पांयस बजकर, चावसं लगकर चित्त घायल
किया फिर वारंवार मनोहर ध्वनि सुनकर ललन क्यों न लल-
चाय जहां हायल पाठहो वहां इसका अर्थ थकित करना
जानना और जब पायलका शब्द ऐसा है तो जाने मुखका
शब्द सुन कर लाल क्यों न ललचायेंगे ॥ ५१० ॥
मोहत अँगूठा पाँयको, अनवट जड़िन जड़ाय ।
जीतौ तरवनि द्युति सुदृढ़, पगे तरणि मनु पाँय ॥
- जडाऊ जड़ावका अनवट पाँवोंके अँगूठेमें शोभा देता है,
चतुर्थ भाग: दोहा ५५१ से ७१९ (भक्ति-भाव, समापन दोहे एवं शब्द-सूची)
( १६८ ) सतसई-सटीक ।
कानकी ढेरियाँने जो इसे अपनी अच्छी कांतिसे जीत लिया है,
इससे मानों हार कर सूरज तियाके पाँव पडरहा है ।
दृष्टान्तालंकार ॥ ५११ ॥
पगअंगुरीवर्णन ।
अरुण सरोरुहसे चरण, अँगुरी अति सुकुमार ।
चुवत सुरँग रँगसी मनो, चपिबिछियनके भार ५१२
चरण लाल कमलसे हैं उसमें अंगुरी अति कोमल हैं
मानों बिछुओंके बोझसे दबके अच्छे लालरंगसी चूती हैं ।
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ५१२ ॥
गतिवर्णन ।
पगपगमगअगमनपरत, चरनअरुनद्युतिझूल ।
ठौर ठौर लखियतु उठै, दुपहरियासी फूल ५१३
मार्गमें पग पगपर आगे गिरतीहै, चरण लालकी कांति झूल
कर, ठौर २ उठे दुपहरियाके फूलसे दीखते हैं अर्थात् चर-
णोंसे चलनेके कारण दुपहरियाके फूलसे परछाईंसे लाल
लाल मार्गमें उठि आये हैं, व्यंग्यसे वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ५१३ ॥
देहद्युतिवर्णन ।
तनु भूषण अंजन दृगनि, पगनि महाउररंग ।
नहिं शोभाको साजियत, कहिबेहीके अंग ५१४
षष्ठशतक ६. ( १६९ )
'तनुमें भूषण, नेत्रोंमें अंजन, चरणोंमें महावरका रंग इनसे
कुछ शोभा नहीं सजती यह तो शरीरमें कहनेहीको हैं
आशय यह कि, शरीरके अंगहीमें मिलजाते हैं इनकी शोभा
दिखाई नहीं देती । मीलितालंकार ॥ ५१४ ॥
मानहु विधि तनु अच्छछवि, स्वच्छ राखिवे काज।
दृग पग पोंछनको किये, भूषन पायनदाज ५१५॥
मानों शरीरकी अच्छी छवि स्वच्छ रखनेके निमित्त विधा-
ताने दृग और पगके पोंछनेको भूषणोंको पायन दाज किया है
जो फरशके आगे देहलीमें पगपोंछन होता है उसे पायनदान
कहते हैं । उत्प्रेक्षालंकार ॥ ५१५ ॥
सहज सेत पचतोरिया, पहरे अतिछवि होत ।
जलचादरके दीपज्यों, जगमगाति तनुजोत ५१६
स्वभावसेही श्वेत पचतोरिया वस्त्रकी धोती पहरकर
उसकी अति शोभा होतीहै जलकी चादरके बीचमें जैसे दीप-
ककी ज्योति जगमगातीहै तात्पर्य यह कि, जैसे पानीकी चाद-
रके पीछे दीपक बालरखनेसे वह चमकता है इसप्रकार
श्वेत साड़ीमें उसकी देह चमकतीहै । पूर्णोपमा ॥ ५१६ ॥
देखी मौनजुही फिरति, माँनजुहीमें अंग ।
दुति लपटन पट सेतमें, करत फिरौटी रंग ५१७
( १७० ) सतसई-सटीक ।
सोनजुही ( स्वर्णयूथी ) से अंगकी पीतजुही ( रूपवाला
अपनी कान्तिकी लपटोंसे श्वेत वस्त्र भी केशरिया रंग करते
हुए फिरते देखी । वनौटी-वनयष्टि । वनोटीरंग-कपासी वा
केशरियारंग । तद्गुणालंकार ॥ ५१७ ॥
वाहि लख लोयनु लगै, कौन जुवतिकी जोति ।
जाके तनुकी छाँहढिग, जोन्ह छाँहसी होति ५१८
उसके देखने पर फिर किस तरुणीकी ज्योति नेत्रोंमें लग स
कती है कि, जिसके शरीर की छायाके निकट चाँदनी छाया-
सी होजाती है । जोन्ह-चाँदनी । उत्प्रेक्षा ॥ ५१८ ॥
कहा कुसुम कहा कौमुदी, कितक आरसी जोति।
जाकी उजराई लखे, आंख ऊजरी होति ॥ ५१९ ॥
क्या फूल क्या चाँदनी और आरसीकी ज्योति कितनी है
जिसकी उजराई देखनेसे आँख ऊजरी होजाती हैं। प्रतीपालं-
कार ॥ ५१९ ॥
कहि लहि कौन सक दुरी, सोनजुहीमें जाय ।
तनुकी सहज सुवासना, देती जो न बताय ॥ ५२० ॥
कहो तो उस सोनजुहीमें जाकर छिपीहुईको कौन पासकता
था, जो उसके शरीरकी सहज सुवासना उसे न बतादेती ।
उन्मीलितालंकार ॥ ५२० ॥
षष्ठशतक ६. ( १७१ )
रहि न सक्यो कसुकरि रह्यो,वशकरि लीनो मार।
भेदि दुसार कियो हियो, तनुद्युति भेदी सार ५२१
रह नहीं सका बलकर हार गया कामदेवने अपने वशमें
करहीलिया छेदकर मेरे हियेको वारपार करदिया तनुकी
कान्तिने बरछीछेद दी । काव्यलिंग ॥ ५२१ ॥
कंचन तन धन वरन वर, रह्यो रंग मिलि रंग ।
जानीजात सुवासही, केशर लाई संग ॥ ५२२ ॥
उसके शरीरका वर्ण कंचनसे श्रेष्ठ है, उसमें रंगमें रंग
मिला है इस कारण अंगमें लगी हुई केशर सुगंधहीसे जानी-
जाती है, अर्थात् सुगंधके बिना केसर और उसके शरीरका
वर्ण एक प्रतीत होता है । उन्मीलिनालंकार ॥ ५२२ ॥
ह्वै कपूर मणिमय रही,मिलति न द्युति मुकतालि।
छिन छिन खरी विचक्षणी,लहत छानि तृणआलि
मोतियोंकी लड़ी शरीरकी कान्तिमें मिलकर कपूरसी
होकर मनमें रही सखी चतुरभी है, परन्तु खड़ी हुई छिन
छिनमें छप्परका तिनका लेती है; अर्थात् मोतीमाला
देख महामोहित होती है, चतुर सखी यह देख तृण
तोड़ती है ॥ ५२३ ॥
बाल छबीली तियनमें, बैठी आप छिपाय ।
( १७२ ) सतसई-सटीक ।
अरगटही फानूससी, परगट होत लखाय ॥५२४॥
वह बाला छबीली स्त्रियोंमें आप छिपकर बैठी परन्तु
घूँघटहीमें फानूससी प्रगट होकर दीखती है। पूर्णोपमा ५२४॥
करत मलिन आछी छविहि, हरतु जु सहजविकास
अंगराग अंगनि लज्यो, ज्यों आरसी उसास ५२५
यह तनुकी अच्छी छबिको मलीन करती है, स्वाभाविक
विकास ( चमक ) को हरण करता है, यह अंगोंमें लगा-
हुआ अंगराग ऐसा है, जैसे आरसीके स्वच्छ दर्पणपर, श्वा-
सकी भाप । पूर्णोपमा ॥ ५२५ ॥
पहिर न भूषण कनकके, कहि आवत यहि हेत ।
दर्पणकेसे मोरचे, देह दिखाई देत ॥ ५२६ ॥
सोनेके भूषण मत पहने यह बात कहनेमें आती है कि,
दर्पणकेसे मोरचे मेरी देह में दिखाई देते हैं, आशय यह
कि, तू यह मत जाने कि, मैं तेरा गहना उतरवाती
हूँ परन्तु यह तेरे शरीरके सामने मैले लगते हैं। विषमा-
लँकार ॥ ५२६ ॥
लीनेहू साहस सहस, कीने यतन हजार ।
लोयन लोयन सिंधु तन, पैरि न पावत पार ५२७
सहस्र साहस ( हिम्मत ) करके तथा सहस्र यत्न करके
भी शरीररूपी शोभा समुद्र पैर कर आंख पार नहीं पाती
षष्ठशतक ६. ( १७३ )
अर्थात् छबीलीके शोभारूप समुद्रमें तैरते हुए प्रीतमके नेत्र
थकगये । छेकानुप्रास जमकालंकार ॥ ५२७ ॥
दीठि न परत समान द्युति, कनक कनकसे गात।
भूषनकर करकस लगत, परसि छिपाने जात ५२८
कनकसे गात अर्थात् सुवर्णसे शरीरपर कंचन ( सुवर्ण )
दृष्टि तो नहीं पड़ता कारण कि, दोनोंकी समान कांति है
जब वे गहने हाथ में छूनेसे करकस लगते हैं, तब पहचाने
जाते हैं । उन्मीलितालंकार ॥ ५२८ ॥
अंग अंग नग जगमगत, दीपशिखासी देह ।
दिया बढ़ायेहू रहै, बड़ो उजेरो गेह ॥ ५२९ ॥
प्यारीके सब अंग अंग हीरे मोतीसे जगमगाते हैं, दीप-
ककी शिखाके समान सब देह है, दिया बढ़ाये परभी
घरमें बड़ा उजेला रहता है । अतद्गुण पूर्णोपमा ॥ ५२९ ॥
अंग अंग प्रतिबिम्बपर, दर्पणसे सब गात ।
दुहरे तिहरे चौहरे, भूषण जाने जात ॥ ५३० ॥
अंग २ का अंग २ में प्रतिबिम्ब पड़ता है, सब अङ्ग
दर्पणसे चमकते हैं, प्रतिबिम्बके कारण वे भूषण दुहरे तिहरे
चौहरे जाने जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३० ॥
अंग अंग छविकी लपटि, उपजति जात अछेह।
( १७४ ) सतसई-सटीक ।
खरी पातरीऊ तऊ, लगै भरीसी देह ॥ ५३१ ॥
प्यारीके अंग अंगसे छबिकी छटा निरन्तर उपजती
जाती है, यद्यपि अधिक पतली है, परन्तु शोभासे भरीसी
देह लगती है। लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ५३१ ॥
रंच न लखियत पहरि या, कंचनसे तनु बाल ।
कुँभिलानी जानीपरै, उर चपका माल ॥५३२॥
बालाके सोनेसे शरीरमें पहरी हुई तनकभी नहीं जानी
जाती, परन्तु हृदयपर मुरझानेसे चम्पेकी माला जानी जाती
है। उन्मीलित ॥ ५३२ ॥
त्यों त्यों प्यासेई रहत, ज्यों ज्यों पियत अघाय।
सगुन सलौने रूपको, नहिं चख तृषा बुझाय५३३
ज्यों ज्यों पेट भरकर पीते हैं त्यों त्यों प्यासेही रहतेहैं
गुणवान् सलौने रूपको देखकर नेत्रोंकी प्यास नहीं बुझती।
विशेषोक्ति ॥ ५३३ ॥
लिखनबैठ जाकी सबहि, गहि गहिग रबगरूर ।
भये न केते जगतके, चतुर चितेरे कूर ॥५३४॥
गर्व गरूर ग्रहण करके उसके चित्रको लिखनेको बैठे
जगतके कितने चतुर चित्रकार कूढ़ अर्थात् मूर्ख न होगये ।
विशेषोक्ति सबहि तस्वीर ॥ ५३४ ॥