सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

( १५६ ) सतसई-सटीक ।
जटित नीलमणि जगमगत, सींक सुहाई नाक ।
मनो अली चम्पककली, बसि रस लेत निशंक ।
नीलमणिकी जड़ी हुई झलकी नाकपर शोभा देती है
मानों भौंरा चम्पेकी कलीमें निवास कर रस लेता है। वस्तु-
उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४७२ ॥
यदपि लौंग ललितौ तऊ, पहिर न तू इक आँक।
सदा शंक बढिये रहै, यहै चढेसी नाक ॥ ४७३ ॥
यद्यपि लौंग सुन्दर है, तो भी तू मत पहरे, इसमें निश्चय
मान यह तेरी चढीसी नाक देखकर सदा शंका बढतीही
रहती है अर्थात् नाक चढनेसे मानका भ्रम होता है। व्याज-
स्तुति ॥ ४७३ ॥
इन दोई मोती सुगथ, तू नथ गरब निशांक ।
जिह पहरत जग दृग ग्रसत, लसत हंसत सीनाँक॥
इन दोई मोतीके अच्छेप्रकारसे गुथनेसे हे नथ! तू निःशंक
गर्वकर, जिसके पहरनेसे जगत्के नेत्र ग्रसकर नासिका हँसती-
सी विदित होतीहै ! काव्यलिंग ॥४७४॥
बेसरमोती धनि तुही, को पूछै कुल जाति ।
पीबोकर तियओठको, रसनिधरक दिनराति४७५