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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 213

( १६० ) सतसई-सटीक ।
ठोडी गाड गड्योतऊ, उडोरहत दिनरात ४८६
जो तुझे देखकर मेरे मनने जो पकडीहै सो गति कही नहीं
जाती है, यद्यपि ठोडीके गर्तमें पडाहै तथापि दिनरात उड
ताही रहताहै यदि कहो दिनरात उड़नेसे उड़नेकी पुष्टाई नहीं
है तो इसका भाव यह कि,कहीं हाथ चिबुकको स्पर्श न करे
यही सोच रहताहै ॥ ४८६ ॥
ललित श्याम लीला ललन,चढीचिबुकछबि दून।
मधु छाक्यो मधुकर पर्यो,मनो गुलाबप्रसून४८७
हे कृष्ण ! सुन्दर श्याम गुदानेसे उसकी चिबुककी शो-
भा दूनी बढगई है, जैसे मकरन्दसे मत्त हो भौंरा गुलाबके फूल-
पर टूटपड़ा हो। उत्प्रेक्षा मुखवर्णन ॥ ४८७ ॥
सूर उदितहू मुदित मन,मुख सुखमाकी ओर ।
चिते रहत चहुँओरते, निहचल चखनिचकोर ॥
सूर्यके उदय होनेसेभी प्रसन्न मन होकर मुखकी शोभाकी
ओर चारों ओर निश्चल हुए चकोरोंके नेत्र तुझे देखतेही
रहते हैं। भ्रांति मुखकी सुखमा सब ओर है ॥ ४८८ ॥
पत्राही तिथि पाइये, वा घरके चहुँपास।
नितप्रति पून्योही रहै, आनन ओप उजास ४८९॥