बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) सतसई-सटीक ।
पहरतही गोरे गरे, यों दौरी द्युति लाल ।
मनो परसि पुलकित भई, मौलसिरीकी माल ॥
हे कृष्ण ! गोरे गलेमें पहरतेही इसप्रकारसे शोभा दौडी
मानों छूनेसेही मौलसिरीकी माला रोमाञ्चित हुई हो तात्प-
र्य यह कि, प्यारीने प्यारेकी दी हुई वह माला गोरे गलेमें
पहरी उससे यों उसकी छबि बढ़ी मानों लालके हाथसे
स्पर्श हुई हो । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४९३ ॥
बड़े कहावत आपहू, गरुए गोपीनाथ ।
तौ बदिहौं जो राखिहो, हाथनि लखि मन हाथ ॥
हे गोपीनाथकृष्ण! आपभी बड़े गौरवके कहाते हो परन्तु
जो उसके हाथको देखकर मन अपने हाथमें रक्खोगे तो मैं
जानूंगी । संभावना ॥ ४९४ ॥
वेई कर व्यौरन वहैं, व्यौरो कौन विचार ।
जिनहीं उरझो मो हियो, तिनहीं सुरझेबार ४९५॥
हे सखी ! वेही हाथ हैं और वही झाडना वा सुलझानाहै भेद
किस विचारसे है जिनमें मेरा हृदय उलझा है उन्हींसे बाल
सुलझे । पंचम विभावना ॥ ४९५ ॥
गोरी छिगुनी नख अरुन, छलास्याम छबिदेइ ।
लहति मुकति रति क्षणिक यह, नैन त्रिवेनीसेइ ॥