बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १५७ )
हे बेसरके मोती ! तू ही धन्यहै ऐसे विषयमें कोई कुल
जाति नहीं पूछता तू। प्यारीके ओठका रस रातदिन पीता रह।
अन्योक्ति ॥ ४७५ ॥
वरन वास सुकुमारता, सबविधि रही समाय ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, गात न जानी जाय ४७६॥
वरन ( रंग ) सुगंधि सुकुमारता सब प्रकार उसमें समा-
रहीहै जो गुलाबकी पंखुरी भी शरीरसे लगी हुई नहीं जानी
जाती गुलाब और शरीरका रंग एकसाहै ॥ ४७६ ॥
लौने मुख दीठि न लगै, यों कहि दीनों ईठि ।
दूनी ह्वै लागन लगी, दिये डिठौना दीठि ४७७॥
इस सलोने मुखपर किसीकी नजर न लगे यों कह सखी-
ने स्याही की बिन्दी लगादी, दीठ डिठौनाके लगातेही दूनी
हो लगने लगी । विषमालंकार ॥ ४७७ ॥
पिय तियसों हँसिकै कह्यो, लखि डिठौना दीन ।
चन्द्रमुखी मुखचंद्र तें, भलो चन्द्रसम कीन ४७८
प्यारीको डिठौना स्याहीकी बिन्दी लगाये देख पियाने
तियासे हँसकर कहा, हेचन्द्रवदनि ! तुमने अपना मुखचंद्र
अच्छा चन्द्रमाके समान किया अर्थात प्रथम निर्मल चन्द्र-