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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 211

( १५८ ) सतसई-सटीक ।
माके समान और अब श्यामतायुक्त चन्द्रमाके समान किया।
व्यतिरेक ॥ ४७८ ॥
लसत सेतसारी ढक्यो, तरल तरौना कान ।
परो मनो सुरसरिसलिल, जनु रविबिंबमहान ॥
सफेद सारीसे ढकी चमकती ढेरी नायकाके कानमें ऐसे
शोभा देतीहै, मानों प्रभात काल गंगाजलमें सूर्यकी परछाई
पड़ीहो । वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ४७९ ॥
लसै मुरासा तियश्रवन, यों मुकतानि दुति पाय ।
मानों परस कपोलके, रहे स्वेदकण छाय ४८०॥
प्यारीके कानोंमें मोतियोंकी कान्तिको पाकर तरकी
ऐसी शोभा देती हैं जैसे कपोलोंके छूनेसे ( स्वेदकण )
पसीनेके कण छारहेहैं। हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४८० ॥
शालतहै नटसालसी, कैहू निकसति नाहिं ॥
मनमथने जानो कसी, खुबी खुबी मनमाहिं ४८१
टूटे कांटेके समान खटकतीहै किसीप्रकार नहीं निक-
लती कामदेवके भालेकी नोकके समान भली प्रकारसे मेरे
मनमें खुबी चुभीहै। पूर्णोपमा ॥ ४८१ ॥
झीने पटमें झुलमिली, झलकत ओप अपार ।
सुरतरुकी मनु सिंधुमें, लसति सपल्लव डार४८२