बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १५९ )
महीन वस्त्रमें (झुलमुली) कानके पत्तोंकी अपार ज्योति च-
मकतीहै मानों सागरमें कल्पवृक्षकी डार पत्तों सहित स्थित
हो । उत्प्रेक्षा ॥ ४८२ ॥
नेक हँसोही बान तजि,लख्योपरत मुख नीठि ।
चौका चमकनि चौंधमें,परत चौंधसी दीठि॥४८३
सखी तू नेक हँसनेका स्वभाव छोड़दे तेरा मुख नजरभर
कर देखाजायहै, दांतके चौककी चमकसे हमारी दृष्टि चौंधा-
ईसी होजातीहै । काव्यलिंग ॥ ४८३ ॥
कुचगिरिचढिअतिथकितहै,चलीदीठमुख चाड॥
फिरि न टरी परियरही,परी चिबुकके गाड ॥४८४
मेरी दृष्टि कुचरूपी पर्वत पर चढ़ फिर बहुत हारके मुख
की सुन्दरताकी ओर चली, परन्तु फिर वहांसे आगे न चली
ठोडीके गर्तमें पडी पडीही रही। काव्यलिंग ॥ ४८४ ॥
डारे ठोडी गाड गहि,नैनबटोही मार ।
चिलकचौंधमें रूपठग,हांसीफांसी डार ॥४८५॥
मुखकी ज्योतिरूप प्रकटचांदनीमें सुन्दरतारूप ठगने
हाँसीकी फांसी डालकर कितने नेत्ररूप बटोही मारकर ठोडीके
गढेमें डालदियेहैं। सावयवरूपक ॥ ४८५ ॥
तौ लगि या मन जो गई,सो गति कही न जानि।