बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. (१७५)
मानहुँ सुरसरिता विमल, जल उछरत युग मीन॥
झीने घूँघटके वस्त्रमें चञ्चल नेत्र चमचमाते हैं मानों
गंगाजीके उज्ज्वल जलमें दो मछली उछलती हैं। वस्तु उत्प्रे-
क्षा। वस्त्र श्वेत ॥ ४६८ ॥
वारों बलि तो दृगनिपर, अलि खंजन मृगमीन ।
आधी दीठि चितौन जेहि, किये लाल आधीन ॥
तेरे इन नेत्रोंपर मैं भौंरे ममोले मृग और मीनको भी वार-
डारूं जो तैंने आधी दृष्टिसे देखतेही कृष्णको अपने आधीन
करलिया । व्यतिरेकालंकार ॥ ४६९ ॥
जे तब हुती दिखादिखी, भई अमी दृक अंक ।
दगै तिरीछी दीठि अब, ह्वै बीछीको डंक ॥४७०॥
जो तब देखा देखी थी वह निश्चयही अमृतरूप हुई थी
अब तो वह तिरछी दृष्टि बिच्छूका डंक होकर दागती (डस-
ती) है । पर्याय अलंकार ॥ ४७० ॥
बेधक अनियारे नयन, बेधत करत निषेध ।
बरबस बेधत मो हियो, नौ नासाको बेध ॥४७१॥
यह तेरे तीक्ष्ण नेत्र बेध डालने में इन्हें रोकनेका निषेध न
कर तेरी नासाका बेधही बरबस मेरा मन बेध डालता है ।
चतुर्थ विभावना ॥ ४७१ ॥