बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १६१ )
प्यारीके घरके चारों ओर पत्रेहींसें तिथिका पता लगता
है कारण कि, उसके मुखके उजालेसे नित्य प्रति पूनोहीं रहती
है। परिसंख्यालंकार ॥ ४८९ ॥
छिप्यो छबीलो मुख लसै, नीले अंचल चीर ।
मनो कलानिधि झलमले, कालिन्दीके नीर ४९०
नीले अंचलमें छिपा हुआ प्यारीका छबीला मुख ऐसे
शोभा देता है, मानों नीले अंचलको चीरकर चन्द्रमा का-
लिन्दी यमुनाके नीरमें शोभा देता है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९० ॥
जरीकोर गोरे वदन, खरी बढ़ी छवि देख ।
लसत मनो बिजुरी किये, शारदशशि परिवेख ॥
जरीकी किनारी गोरे मुखपर अति बढ़ीहुई शोभा देती
है मानों शरदके चन्द्रमापर बिजली मण्डलाकार किये शो-
भित है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९१ ॥
ग्रीवावर्णन ।
खरी लसत गोरे गरे, धसति पानकी पीक ।
मनो गुलूबंद लालकी, लाल लाल दुतिलीक ४९२
गोरे गलेमें अति धसती हुई पानकी पीक अति शोभा देती
है मानों लालोंका गुलूबंद पहरे है, हे कृष्ण । इसप्रकार
लाटछकीर दीखती है। हेतु उत्प्रेक्षा ॥ ४९२ ॥
११