सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( १४४ ) सतसई-सटीक ।
मरवेको साहस कियो, बढे विरहकी पीर ।
दौरति है समुहे शशिहि, सरसिज सुरभिसमीर ॥
विरहकी पीर बढजानेसे वियोगिनीने मरनेका साहस
किया है, चन्द्रमा कमल सुगन्धित पवन इनके सन्मुख दौ-
रती है तात्पर्य यह कि, वियोगीको उपरोक्त वस्तु ताप देती
है सो वह इनके समीप धावमान होती है कि, अधिक अग्निसे
शरीर भस्म होजाय, यहाँ चन्द्रमादि उद्दीपन विभाव हैं,
विचित्रांलंकार [ दोहा-जहँ निज इच्छा किये ते फल विपरीत
लखाय । तेहि विचित्र भूषण कहत, कविजन हिय
हुलसाय ] ॥ ४३४ ॥
सुनतपथिकमुहँमाहानिशि, लुएँचलत उहिगाम ।
बिन बूझे बिनहू कहे, जियत विचारी वाम॥४३५॥
पथिकके मुखसे यह बात सुनकर कि, माहकी रातमें
उस गाममें लुएँ चलती हैं, बिना बूझे बिनाही कहे प्रोषित
पतिका बालाके नायकने विचारलिया कि, प्यारी अबतक
जीतीहै चलें । अनुमान ॥ ४३५ ॥
मानों मनुहारी भरी, मान्यो खरी मिठाहिं ।
वाको अति अनखाहटो, मुसकाहट बिन नाहिं ॥
धृष्टनायककथन, सखी मारभी उसकी प्यारसे भरी ह

पंचमशतक ५. ( १४५ )
और गारीभी अति मीठी लगती हैं, उसका अधिक अनखाना
भी मुसकुराहटके बिना नहीं है। विरोधक्रिया बिन विरोधा-
लंकारवर्णन ॥ ४३६ ॥
लहि रतिसुख लगिये गरे, लखी लजीली डीठि
खुलत न मो मनगडिरही, वहैअधखुलीनीठि ४३७
नायकवचन, हेसखि ! जिस समय वह रतिका सुख लेकर
गलेसे लगी, और लाजभरी दृष्टिसे देखा, सो वह उसकी अ-
धखुली दृष्टि छुटती नहीं, मेरे मनमें गडरहीहै। विरोधाभास !
[ दो०-जो विरोधवत भासियत, अरु विरुद्ध नहिं होयकहत
विरोधाभास तेहि, कविजन जानत कोय] ॥ ४३७॥
बडी कुटुमकी भीरमें, रही पैठ दे पीठि।
तऊ पलक परिजात इत, हेरि हँसौही डीठि ४३८
कुटुम्बके लोगोंकी बड़ी भीरमें यद्यपि वह पीठ देकर बैठ
गई है तथापि स्वभावसे हँसीली दृष्टिसे इधर पलक पड़जातीहै
और देखतीहै । तृतीय विभावना ॥ ४३८ ॥
सरसत पोंछति लखिरहत, लागि कपोलकें ध्यान ।
करिलेप्यो पाटल विमल, प्यारी पठये पान४३९
कहीं प्यारीके भेजे पान प्यारेके पास आये उन्हें देखकर
कपोलोंका ध्यान आगया, इसपर सखी कहनेलगी दूतीहें

( १४६ ) सतसई-सटीक ।
पोंछते हैं देखते रहजातेहैं प्यारीके गालोंके ध्यानमें लगेहुए
गुलाबसे निर्मल हाथमें प्यारीके भेजे पान लेकर सरसते हैं
पाटल-कुछ सफेदी और लाली लिये गुलाब । सरसतका अर्थ
चिकनानेका है ॥ ४३९ ॥
नखशिखवर्णन ।
सहज सुचिक्कन स्याम रुचि,शुचिसुगंधसुकुमार।
गनत न मनपथअपथलखि,बिथुरेसुथरेबार ४४०.
स्वभावसे चिकने, कारे कान्तिमान्, पवित्र, सुगंधित और
कोमल बिखरे सुन्दर बार उसके देखकर मेरा मन पथ अपथ
भला बुरा नहीं विचारता । जाति अलंकार [दोहा-निजजाति
नके कर्म गुण, जामें मिलहिं प्रवीन ॥ ताहि जातिभूषण
कहत, यह मत अतिप्राचीन ] ॥ ४४० ॥
छुटे छुटावैं जगतसे, सटकारे सुकुमार ।
मन बाँधत वेणी बँधे, नीलछबीरे बार ॥ ४४१ ॥
प्यारीके बाल छुटे ( खुले ) हुए जगत्से छुटादेतेहैं, इस
प्रकार सटकारे( लम्बे पतले ) और कोमल हैं और वेणी बाँ-
धनेसे मनको बांधते हैं इस प्रकार नीले छबिभरे बारहैं । चतुर्थ
विभावना ॥ ४४१ ॥
कुटिलअलकछुटिपरतमुख,बढिगोइतो उदोत ।
बँक बँकारी देत ज्यों, दाम रुपैया होत ॥४४२॥

पंचमशतक ५. (१४७)
टेढ़ी अलकें छूटकर पड़तेही मुखकी इतनी ज्योति बढ़
गई जैसे टेढ़ी लकीर देनेसे दामका रुपैया होजाताहै। पूर्णो-
पमा ॥ ४४२ ॥
कच समेट कर भुज उलटि,खरा शीशपट टारि ।
काको मन बाँधे न यह,जूरी बाँधनिहारि ॥४४३॥
बाल समेट कर भुजा उलटकर (पीछे करके) तथा शिर
का कपड़ा हटाकर यह जूड़ाबाँधनेवारी किसका मन नहीं
बाँधती। जातिअलंकार ॥ ४४३ ॥
नीको लसत ललाटपर, टीको जरित जराय ।
छबिहि बढ़ावत रवि मनौं, शशिमंडलमें आय ॥
टीका वर्णन, जडाऊजडित टीका माथे पर बहुत अच्छा
लगता है मानों सूर्य चंद्रमण्डलमें आकर छविको बढ़ाताहै।
उक्तारूपदोत्प्रेक्षा ॥ ४४४ ॥
कहत सब बेंदी दिये, आंक दशगुणो होत ।
तिय लिलार बेंदी दिये, अगणित बढ़त उदोत ॥४४५॥
यह सब कहतेहैं कि बिन्दी देनेसे अंक दशगुणा होजाताहै,
परन्तु प्यारीके माथेपर बेंदी लगानेसे अगणित कांति
बढ़ती है। व्यतिरेकालंकार ॥ ४४५ ॥

( १४८ ) सतसई-सटीक ।
भाल लाल बेंदी ललन, आखत रहे विराजि ।
इंदुकला कुजमें बसी, मनौं राहुभयभाजि ॥४४६॥
हे ललन कृष्ण ! वह माथेपर लाल रोलीकी बेंदी लगायेहै,
उसपर चावर लगे हुये ऐसे शोभा देतेहैं कि, मानों चंद्रमाकी
कला मंगलमें आबसी है राहुके डरसे भागकर । उक्तास्पदव-
स्तूतप्रेक्षा ॥ ४४६ ॥
सबै सुहायेही लगैं, बसे सुहाये ठाम ।
गोरे मुँह बेंदी लसै, अरुण पीत सित श्याम॥४४७॥
शोभित ठौरमें बसनेसे सब अच्छे लगते हैं, जैसे गोरे
मुखपर बेंदी शोभा देती है, तथा लाल पीली श्वेत श्याम
यह सब शोभित होते हैं लाल रोली, पीली केशर, श्वेत चंदन-
काली कस्तूरी वा काजरकी बिन्दी। दृष्टान्तालंकार॥४४७॥
तियमुख लगि हीराजरी, बेंदी बढ़ै विनोद ।
सुतसनेह मानौं लिये, विधुपूरण बुध मोद॥४४८॥
प्यारीके मुखपर हीराजरी बेंदी देखकर ऐसी प्रसन्नता
बढती है, मानों पुत्रके स्नेहसे पूर्ण चन्द्रमा बुधको गोदीमें
लिये है किसी पुराणमें भी बुधको श्वेत लिखाहै, तथा
कविप्रियामें नाकके बुलाकके मोतीकी उपमा बुधसे दी है ।
उत्प्रेक्षा ॥४४८ ॥

पंचमशतक ५. ( १४९ )
भाल लाल बेंदी दिये, छुटे बार छवि देत ।
गहो राहु अति साहिकर, मनु शशि सूरसमेत ॥
माथेपर लाल बेंदी दियेहै, और छुटे बार ऐसी शोभा देते हैं
मानों चन्द्रमाको सूरज समेत राहुने साहसकर पकड़ा है
यदि कहो निन्दित और पवित्रका संगम कहा तो यों अर्थ
करना कि, माथेपर लाल बेंदी चन्द्रमा सूर्यके समान शोभा
देतीहै वहां राहुभी धीर धारण करगया । उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
मिलि चन्दन बेंदी रही, गोरे मुख न लखाय ।
ज्यों ज्यों मद लाली चढै, त्यों त्यों उघरति जाय॥
चन्दनसे मिलकर गोरे मुखपर लगाई हुई बेंदी देखनेमें
नहीं आती ज्यों ज्यों मुखपर मदकी लाली चढ़तीहै त्यों त्यों
उघड़ती जातीहै । उन्मीलितालंकार ॥ ४६० ॥
सोरठा ।
मंगल बिंव सुरंग, मुख शशि केशर आड गुरु ।
एक नारि लहि संग, रसमय किय लोचन जगत॥

( १५० ) सतसई-सटीक।
दोहा।
पँचरँग रंग बेंदी बनी, उठी उमगि मुखज्योति।
पहरे चीर चुनोटिया, चटक चौगुनी होति ४५२॥
पंचरंग बेंदी प्यारीके लगा है, इससे मुखकी ज्योति जगम-
गा उठी है, तथा सुरमई (रक्त और श्याम) वस्त्र पहरे है, इससे
चौगुनी चटक होरही है। अनुगुणालंकार। एक मुखकी कांति
दूजे पियाका रंग पाय खरीहुई. तीजे बेंदी और चीरसे चौगुनी
चटकहै चिनोटिया सुनहरे रुपहरेके तारोंका वस्त्रभी
होता है ॥ ४५२ ॥
खोरि पनच भृकुटी धनुष, बधिक समर तजि कान।
हनत तरुन मृग तिलकशर, सुरख भाल भरि तान।
व्याधे रूप कामदेवने सब मर्य्यादा छोड़कर खौररूप
प्रत्यंचा भृकुटीरूप धनुषसे तिलकरूप बाणमें लालभाल
भरके चढाय युवारूप मृगको मारा ॥ ४५३॥
नासा मोरि नचाय दृग, करी ककाकी सौंह ।
कांटेसी कसकत हिये, गड़ी कटीली भौंह ॥४५४॥
जो कि, उसने नाक सिकोड नयन नचायकर अपने
ककाकी सौगन्ध खाई उस समयकी उसकी कटीली भौंहें मेरे
हृदयमें गड़ी हुई कांटेसी कसकती हैं । स्वभावोक्ति और
पूर्णोपमा ॥ ३५४ ॥

पंचमशतक ५. ( १५१ )
रससिंगार मज्जन किये, कंजन भंजन दैन ।
अंजनरंजनहू बिना, खंजन गंजन नैन॥४५५॥
शृंगार रसमें स्नान किये हुए कमलको भी लज्जित करने-
वाले सुरमा लगाये विना भी यह नेत्र भौंलेको लज्जित क-
रते हैं । वृत्यनुप्रास ॥ ४५५ ॥
अरत टरत न वरपरे, दई मरक मनु मैन ।
होड़ाहोड़ी बढ़ चले, चित चतुराई नैन ॥४५६॥
हठ करके टलते नहीं हैं और बढ़पड़े हैं मानों कामदेवने
इनको सनकार दिया है चित्त चतुराई और नेत्र होड़ाहोड़ी
बढ़कर चले हैं । हेतु उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४५६ ॥
योगयुक्ति सिखई सबै, मनो महामुनि मैन ।
चाहत पिय अद्वैतता, कानन सेवत नैन ॥४५७॥
मानों महामुनि कामदेवने इसको सब युक्ति योगकी सि-
खाई है पियासे एकता होनेकी इच्छाकर नेत्र कान अथवा
वनको सेवते हैं, योगका अर्थ परमात्मामें मेल होना और
पतिसे संयोग होना काननका अर्थ वन और कान है योगी
वन और नेत्र कानका सेवन करते हैं। एक देशवर्त्तिसावयव-
रूपक ॥ ४५७ ॥

( १५२ ) सतसई-सटीक ।
खेलन सिखये अलि भले, चतुर अहेरी मार ।
काननचारी नैन मृग, नागरनरन शिकार ४५८॥
हे सखी चतुरशि कारी कामदेवने कानन(वन और कान)
तकजानेवाले नेत्ररूपी मृग चतुर मनुष्योंके शिकार करनेवाले
अच्छे खिलाडी सिखाये हैं। अद्भुतरस रूपकालंकार,मृग मनु-
ष्योंका शिकार करते हैं यह अद्भुत है ॥ ४५८ ॥
सायकसम घायक नयन, रँगे त्रिविध रंग गात ।
झखौ बिलखि दुरिजात जल, लखिजलजात लजात
बाणोंके समान घायल करनेवाले नेत्र श्वेत श्याम रक्त तीन
प्रकारके रंगसे रँगे हैं जिनको देखकर मछली जलमें छिप जाती
और दीर्घता देखकर कमल लजाते हैं। हेतु उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
बर जीते शर मैनके, ऐसे देखे मैन ।
हरनीके नैनानते, हर नीके यह नैन ॥ ४६० ॥
हेहरिकृष्ण! इन्होंने बलसे कामके बाण जीतलिये ऐसा मैंने
देखा यह नेत्र तो हरनीके नेत्रोंसे भी नीके अच्छे हैं चंचलता।
काव्यलिंग और यमक ॥ ४६० ॥
झूँठे जान न संग्रहै, मन मुख निकसे वैन ।
याहीते मानहु किये, बातनको विधि नैन४६१॥

पंचमशतक ५. ( १५३ )
दोनोंका मन मुँहसे निकले वचनोंको झूठे जान कर संग्रह
नहीं करता, इसीसे मानों ब्रह्माने बातें करनेको नेत्र
बनाये हैं । सिद्धास्पदहेतूत्प्रेक्षा ॥ ४६१ ॥
दृगनि लगत वेधत हियो, विकल करत अँग आन।
यह तेरे सवसे विषम, ईछन तीछन वान ४६२॥
आँखों में लगते हैं और हृदयको वेधते हैं आनही सब
अंगोंको विकल करदेते हैं तेरे यह नेत्ररूपी पैन तीर सवसे
कठिन (विषम) हैं । असंगति ॥ ४६२ ॥
फिरि फिरि दौरत देखियत, निचले नेक रहैंन ।
ए कजरारे कौन पर,करत कजाकी नैन॥४६३॥
यह वार वार दौड़ते देखे जाते हैं क्षणमात्रको भी नि-
चले नहीं रहते यह काजर विना दियेही काजर दियेसे किस
पर दौड़ करते हैं। वाचकोपमान लुप्तोपमालंकार ॥ ४६३ ॥
सारी डारी नीलकीं, ओट अचूक चुकैंन ।
मो

( १५४ ) सतसई-सटीक ।
नीचेही नीचे निपट, डीठि कुहीलों दौरि ।
उठि ऊँचे नीचे दियो, मन कुलंग झकझोरि ४६५
अति नीचेही नीचे उसकी दृष्टिने कुही ( छोटी बलिष्ठ
चिड़िया ) के समान दौड़ कर देखा और उठ कर मेरे मन-
रूपी कुलंगको ऊंचे नीचे दबोच डाला । दुगोपमा । कुही
चिड़िया कुलंगको भगा देती है ॥ ४६५ ॥
फूले फरकत रैफरी, पल कटाक्ष करवार ।
करत बचावत विय नयन, पावक घाय हजार ४६६
दोना स्त्री पुरुषोंको परस्पर चोट करते देख सखी बोली,
हे सखि ! पलककी ढाल और दृष्टिकी तलवार लेकर प्रसन्न
हो कूदते हैं, और दोनोंकेही नेत्ररूपी पावक हजारों घाव
बचाते हैं। श्लेषगर्भित सविषय सावयवरूपक ॥ ४६६ ॥
तिय कत कमनौंती सिखी, बिन जिह भौंहकमान।
चलचित वेधत चुकत नहिं, बंक विलोकनि बान॥
हे प्रिये ! तुमने यह बाणविद्या कहाँ सीखी है कि, विनाही
रोदा चढ़ाये भौंहरूपी कमानसे बांण छोड चित्तरूपी निशा-
नेको मारती हो तेरे बांके देखनेके बाण चूकतेही नहीं। द्वितीय
विभावना ॥ ४६७ ॥
चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।

पंचमशतक ५. (१७५)
मानहुँ सुरसरिता विमल, जल उछरत युग मीन॥
झीने घूँघटके वस्त्रमें चञ्चल नेत्र चमचमाते हैं मानों
गंगाजीके उज्ज्वल जलमें दो मछली उछलती हैं। वस्तु उत्प्रे-
क्षा। वस्त्र श्वेत ॥ ४६८ ॥
वारों बलि तो दृगनिपर, अलि खंजन मृगमीन ।
आधी दीठि चितौन जेहि, किये लाल आधीन ॥
तेरे इन नेत्रोंपर मैं भौंरे ममोले मृग और मीनको भी वार-
डारूं जो तैंने आधी दृष्टिसे देखतेही कृष्णको अपने आधीन
करलिया । व्यतिरेकालंकार ॥ ४६९ ॥
जे तब हुती दिखादिखी, भई अमी दृक अंक ।
दगै तिरीछी दीठि अब, ह्वै बीछीको डंक ॥४७०॥
जो तब देखा देखी थी वह निश्चयही अमृतरूप हुई थी
अब तो वह तिरछी दृष्टि बिच्छूका डंक होकर दागती (डस-
ती) है । पर्याय अलंकार ॥ ४७० ॥
बेधक अनियारे नयन, बेधत करत निषेध ।
बरबस बेधत मो हियो, नौ नासाको बेध ॥४७१॥
यह तेरे तीक्ष्ण नेत्र बेध डालने में इन्हें रोकनेका निषेध न
कर तेरी नासाका बेधही बरबस मेरा मन बेध डालता है ।
चतुर्थ विभावना ॥ ४७१ ॥

( १५६ ) सतसई-सटीक ।
जटित नीलमणि जगमगत, सींक सुहाई नाक ।
मनो अली चम्पककली, बसि रस लेत निशंक ।
नीलमणिकी जड़ी हुई झलकी नाकपर शोभा देती है
मानों भौंरा चम्पेकी कलीमें निवास कर रस लेता है। वस्तु-
उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४७२ ॥
यदपि लौंग ललितौ तऊ, पहिर न तू इक आँक।
सदा शंक बढिये रहै, यहै चढेसी नाक ॥ ४७३ ॥
यद्यपि लौंग सुन्दर है, तो भी तू मत पहरे, इसमें निश्चय
मान यह तेरी चढीसी नाक देखकर सदा शंका बढतीही
रहती है अर्थात् नाक चढनेसे मानका भ्रम होता है। व्याज-
स्तुति ॥ ४७३ ॥
इन दोई मोती सुगथ, तू नथ गरब निशांक ।
जिह पहरत जग दृग ग्रसत, लसत हंसत सीनाँक॥
इन दोई मोतीके अच्छेप्रकारसे गुथनेसे हे नथ! तू निःशंक
गर्वकर, जिसके पहरनेसे जगत्के नेत्र ग्रसकर नासिका हँसती-
सी विदित होतीहै ! काव्यलिंग ॥४७४॥
बेसरमोती धनि तुही, को पूछै कुल जाति ।
पीबोकर तियओठको, रसनिधरक दिनराति४७५

पंचमशतक ५. ( १५७ )
हे बेसरके मोती ! तू ही धन्यहै ऐसे विषयमें कोई कुल
जाति नहीं पूछता तू। प्यारीके ओठका रस रातदिन पीता रह।
अन्योक्ति ॥ ४७५ ॥
वरन वास सुकुमारता, सबविधि रही समाय ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, गात न जानी जाय ४७६॥
वरन ( रंग ) सुगंधि सुकुमारता सब प्रकार उसमें समा-
रहीहै जो गुलाबकी पंखुरी भी शरीरसे लगी हुई नहीं जानी
जाती गुलाब और शरीरका रंग एकसाहै ॥ ४७६ ॥
लौने मुख दीठि न लगै, यों कहि दीनों ईठि ।
दूनी ह्वै लागन लगी, दिये डिठौना दीठि ४७७॥
इस सलोने मुखपर किसीकी नजर न लगे यों कह सखी-
ने स्याही की बिन्दी लगादी, दीठ डिठौनाके लगातेही दूनी
हो लगने लगी । विषमालंकार ॥ ४७७ ॥
पिय तियसों हँसिकै कह्यो, लखि डिठौना दीन ।
चन्द्रमुखी मुखचंद्र तें, भलो चन्द्रसम कीन ४७८
प्यारीको डिठौना स्याहीकी बिन्दी लगाये देख पियाने
तियासे हँसकर कहा, हेचन्द्रवदनि ! तुमने अपना मुखचंद्र
अच्छा चन्द्रमाके समान किया अर्थात प्रथम निर्मल चन्द्र-

( १५८ ) सतसई-सटीक ।
माके समान और अब श्यामतायुक्त चन्द्रमाके समान किया।
व्यतिरेक ॥ ४७८ ॥
लसत सेतसारी ढक्यो, तरल तरौना कान ।
परो मनो सुरसरिसलिल, जनु रविबिंबमहान ॥
सफेद सारीसे ढकी चमकती ढेरी नायकाके कानमें ऐसे
शोभा देतीहै, मानों प्रभात काल गंगाजलमें सूर्यकी परछाई
पड़ीहो । वस्तूत्प्रेक्षा ॥ ४७९ ॥
लसै मुरासा तियश्रवन, यों मुकतानि दुति पाय ।
मानों परस कपोलके, रहे स्वेदकण छाय ४८०॥
प्यारीके कानोंमें मोतियोंकी कान्तिको पाकर तरकी
ऐसी शोभा देती हैं जैसे कपोलोंके छूनेसे ( स्वेदकण )
पसीनेके कण छारहेहैं। हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४८० ॥
शालतहै नटसालसी, कैहू निकसति नाहिं ॥
मनमथने जानो कसी, खुबी खुबी मनमाहिं ४८१
टूटे कांटेके समान खटकतीहै किसीप्रकार नहीं निक-
लती कामदेवके भालेकी नोकके समान भली प्रकारसे मेरे
मनमें खुबी चुभीहै। पूर्णोपमा ॥ ४८१ ॥
झीने पटमें झुलमिली, झलकत ओप अपार ।
सुरतरुकी मनु सिंधुमें, लसति सपल्लव डार४८२

पंचमशतक ५. ( १५९ )
महीन वस्त्रमें (झुलमुली) कानके पत्तोंकी अपार ज्योति च-
मकतीहै मानों सागरमें कल्पवृक्षकी डार पत्तों सहित स्थित
हो । उत्प्रेक्षा ॥ ४८२ ॥
नेक हँसोही बान तजि,लख्योपरत मुख नीठि ।
चौका चमकनि चौंधमें,परत चौंधसी दीठि॥४८३
सखी तू नेक हँसनेका स्वभाव छोड़दे तेरा मुख नजरभर
कर देखाजायहै, दांतके चौककी चमकसे हमारी दृष्टि चौंधा-
ईसी होजातीहै । काव्यलिंग ॥ ४८३ ॥
कुचगिरिचढिअतिथकितहै,चलीदीठमुख चाड॥
फिरि न टरी परियरही,परी चिबुकके गाड ॥४८४
मेरी दृष्टि कुचरूपी पर्वत पर चढ़ फिर बहुत हारके मुख
की सुन्दरताकी ओर चली, परन्तु फिर वहांसे आगे न चली
ठोडीके गर्तमें पडी पडीही रही। काव्यलिंग ॥ ४८४ ॥
डारे ठोडी गाड गहि,नैनबटोही मार ।
चिलकचौंधमें रूपठग,हांसीफांसी डार ॥४८५॥
मुखकी ज्योतिरूप प्रकटचांदनीमें सुन्दरतारूप ठगने
हाँसीकी फांसी डालकर कितने नेत्ररूप बटोही मारकर ठोडीके
गढेमें डालदियेहैं। सावयवरूपक ॥ ४८५ ॥
तौ लगि या मन जो गई,सो गति कही न जानि।

( १६० ) सतसई-सटीक ।
ठोडी गाड गड्योतऊ, उडोरहत दिनरात ४८६
जो तुझे देखकर मेरे मनने जो पकडीहै सो गति कही नहीं
जाती है, यद्यपि ठोडीके गर्तमें पडाहै तथापि दिनरात उड
ताही रहताहै यदि कहो दिनरात उड़नेसे उड़नेकी पुष्टाई नहीं
है तो इसका भाव यह कि,कहीं हाथ चिबुकको स्पर्श न करे
यही सोच रहताहै ॥ ४८६ ॥
ललित श्याम लीला ललन,चढीचिबुकछबि दून।
मधु छाक्यो मधुकर पर्यो,मनो गुलाबप्रसून४८७
हे कृष्ण ! सुन्दर श्याम गुदानेसे उसकी चिबुककी शो-
भा दूनी बढगई है, जैसे मकरन्दसे मत्त हो भौंरा गुलाबके फूल-
पर टूटपड़ा हो। उत्प्रेक्षा मुखवर्णन ॥ ४८७ ॥
सूर उदितहू मुदित मन,मुख सुखमाकी ओर ।
चिते रहत चहुँओरते, निहचल चखनिचकोर ॥
सूर्यके उदय होनेसेभी प्रसन्न मन होकर मुखकी शोभाकी
ओर चारों ओर निश्चल हुए चकोरोंके नेत्र तुझे देखतेही
रहते हैं। भ्रांति मुखकी सुखमा सब ओर है ॥ ४८८ ॥
पत्राही तिथि पाइये, वा घरके चहुँपास।
नितप्रति पून्योही रहै, आनन ओप उजास ४८९॥

पंचमशतक ५. ( १६१ )
प्यारीके घरके चारों ओर पत्रेहींसें तिथिका पता लगता
है कारण कि, उसके मुखके उजालेसे नित्य प्रति पूनोहीं रहती
है। परिसंख्यालंकार ॥ ४८९ ॥
छिप्यो छबीलो मुख लसै, नीले अंचल चीर ।
मनो कलानिधि झलमले, कालिन्दीके नीर ४९०
नीले अंचलमें छिपा हुआ प्यारीका छबीला मुख ऐसे
शोभा देता है, मानों नीले अंचलको चीरकर चन्द्रमा का-
लिन्दी यमुनाके नीरमें शोभा देता है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९० ॥
जरीकोर गोरे वदन, खरी बढ़ी छवि देख ।
लसत मनो बिजुरी किये, शारदशशि परिवेख ॥
जरीकी किनारी गोरे मुखपर अति बढ़ीहुई शोभा देती
है मानों शरदके चन्द्रमापर बिजली मण्डलाकार किये शो-
भित है। उत्प्रेक्षा ॥ ४९१ ॥
ग्रीवावर्णन ।
खरी लसत गोरे गरे, धसति पानकी पीक ।
मनो गुलूबंद लालकी, लाल लाल दुतिलीक ४९२
गोरे गलेमें अति धसती हुई पानकी पीक अति शोभा देती
है मानों लालोंका गुलूबंद पहरे है, हे कृष्ण । इसप्रकार
लाटछकीर दीखती है। हेतु उत्प्रेक्षा ॥ ४९२ ॥
११

( १६२ ) सतसई-सटीक ।
पहरतही गोरे गरे, यों दौरी द्युति लाल ।
मनो परसि पुलकित भई, मौलसिरीकी माल ॥
हे कृष्ण ! गोरे गलेमें पहरतेही इसप्रकारसे शोभा दौडी
मानों छूनेसेही मौलसिरीकी माला रोमाञ्चित हुई हो तात्प-
र्य यह कि, प्यारीने प्यारेकी दी हुई वह माला गोरे गलेमें
पहरी उससे यों उसकी छबि बढ़ी मानों लालके हाथसे
स्पर्श हुई हो । हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४९३ ॥
बड़े कहावत आपहू, गरुए गोपीनाथ ।
तौ बदिहौं जो राखिहो, हाथनि लखि मन हाथ ॥
हे गोपीनाथकृष्ण! आपभी बड़े गौरवके कहाते हो परन्तु
जो उसके हाथको देखकर मन अपने हाथमें रक्खोगे तो मैं
जानूंगी । संभावना ॥ ४९४ ॥
वेई कर व्यौरन वहैं, व्यौरो कौन विचार ।
जिनहीं उरझो मो हियो, तिनहीं सुरझेबार ४९५॥
हे सखी ! वेही हाथ हैं और वही झाडना वा सुलझानाहै भेद
किस विचारसे है जिनमें मेरा हृदय उलझा है उन्हींसे बाल
सुलझे । पंचम विभावना ॥ ४९५ ॥
गोरी छिगुनी नख अरुन, छलास्याम छबिदेइ ।
लहति मुकति रति क्षणिक यह, नैन त्रिवेनीसेइ ॥

पंचमशतक ५. - ( १६३ )
कन अँगुरी गोरी है नख लाल हैं छल्ला काला छबिदे-
रहा है यही क्रमसे गंगा सरस्वती और यमुना हैं, हे नेत्र !
यह त्रिवेणी सेयकर क्षणमें रतिरुपी मुक्ति होजाती है ।
रूपका० ॥ ४९६ ॥
चलन न पावत निगममग, जग उपजो अति त्रास
कुच उतंग गिरिवर गहो,मीना मैन मवास४९७॥
अब शास्त्रका मार्ग नहीं चलनेपाता जगतमें अति त्रास
उपज रहा हे कारण कि. कामरूपी भीलने स्तनरूपी ऊँचे
पर्वतोंकी कठिन ठौरमें अपना निवास कर रक्खा हे निगम-
मग-जिस मार्गकी खबर न पड़े । मवास-कठिन ठौर “रूपका-
लंकार” मेवाडके रहनेवाली जातके लोग जो लुटेरे हैं वह
मीना कहाते हैं वे वन पहाड़ोंकी कंदरामें रहते हैं ॥ ४९७॥
गाढ़े ठाढ़े कुच न ढिल, को पियहिय ठहराय ।
उकसों हँही तो हिये, दई सवत उकसाय ४९८॥
इन घने कठोर कुचोंके सामने ढिलकर पियाके सामने
कौन सौत ठहरेगी, तेरे स्तनोंने उकसनेही नायकके मनसे
सब सौतें हटादीं चतुर्थ विभावना ॥ ४९८ ॥
दुरति न कुचबिच कंचुकी, चुपरो मारौ मेत ।
कवि आंकनिके अथेलों, प्रगट दिखाई देत ४९९