सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 200

पंचमशतक ५. (१४७)
टेढ़ी अलकें छूटकर पड़तेही मुखकी इतनी ज्योति बढ़
गई जैसे टेढ़ी लकीर देनेसे दामका रुपैया होजाताहै। पूर्णो-
पमा ॥ ४४२ ॥
कच समेट कर भुज उलटि,खरा शीशपट टारि ।
काको मन बाँधे न यह,जूरी बाँधनिहारि ॥४४३॥
बाल समेट कर भुजा उलटकर (पीछे करके) तथा शिर
का कपड़ा हटाकर यह जूड़ाबाँधनेवारी किसका मन नहीं
बाँधती। जातिअलंकार ॥ ४४३ ॥
नीको लसत ललाटपर, टीको जरित जराय ।
छबिहि बढ़ावत रवि मनौं, शशिमंडलमें आय ॥
टीका वर्णन, जडाऊजडित टीका माथे पर बहुत अच्छा
लगता है मानों सूर्य चंद्रमण्डलमें आकर छविको बढ़ाताहै।
उक्तारूपदोत्प्रेक्षा ॥ ४४४ ॥
कहत सब बेंदी दिये, आंक दशगुणो होत ।
तिय लिलार बेंदी दिये, अगणित बढ़त उदोत ॥४४५॥
यह सब कहतेहैं कि बिन्दी देनेसे अंक दशगुणा होजाताहै,
परन्तु प्यारीके माथेपर बेंदी लगानेसे अगणित कांति
बढ़ती है। व्यतिरेकालंकार ॥ ४४५ ॥