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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 205

( १५२ ) सतसई-सटीक ।
खेलन सिखये अलि भले, चतुर अहेरी मार ।
काननचारी नैन मृग, नागरनरन शिकार ४५८॥
हे सखी चतुरशि कारी कामदेवने कानन(वन और कान)
तकजानेवाले नेत्ररूपी मृग चतुर मनुष्योंके शिकार करनेवाले
अच्छे खिलाडी सिखाये हैं। अद्भुतरस रूपकालंकार,मृग मनु-
ष्योंका शिकार करते हैं यह अद्भुत है ॥ ४५८ ॥
सायकसम घायक नयन, रँगे त्रिविध रंग गात ।
झखौ बिलखि दुरिजात जल, लखिजलजात लजात
बाणोंके समान घायल करनेवाले नेत्र श्वेत श्याम रक्त तीन
प्रकारके रंगसे रँगे हैं जिनको देखकर मछली जलमें छिप जाती
और दीर्घता देखकर कमल लजाते हैं। हेतु उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
बर जीते शर मैनके, ऐसे देखे मैन ।
हरनीके नैनानते, हर नीके यह नैन ॥ ४६० ॥
हेहरिकृष्ण! इन्होंने बलसे कामके बाण जीतलिये ऐसा मैंने
देखा यह नेत्र तो हरनीके नेत्रोंसे भी नीके अच्छे हैं चंचलता।
काव्यलिंग और यमक ॥ ४६० ॥
झूँठे जान न संग्रहै, मन मुख निकसे वैन ।
याहीते मानहु किये, बातनको विधि नैन४६१॥