बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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पंचमशतक ५. ( १५३ )
दोनोंका मन मुँहसे निकले वचनोंको झूठे जान कर संग्रह
नहीं करता, इसीसे मानों ब्रह्माने बातें करनेको नेत्र
बनाये हैं । सिद्धास्पदहेतूत्प्रेक्षा ॥ ४६१ ॥
दृगनि लगत वेधत हियो, विकल करत अँग आन।
यह तेरे सवसे विषम, ईछन तीछन वान ४६२॥
आँखों में लगते हैं और हृदयको वेधते हैं आनही सब
अंगोंको विकल करदेते हैं तेरे यह नेत्ररूपी पैन तीर सवसे
कठिन (विषम) हैं । असंगति ॥ ४६२ ॥
फिरि फिरि दौरत देखियत, निचले नेक रहैंन ।
ए कजरारे कौन पर,करत कजाकी नैन॥४६३॥
यह वार वार दौड़ते देखे जाते हैं क्षणमात्रको भी नि-
चले नहीं रहते यह काजर विना दियेही काजर दियेसे किस
पर दौड़ करते हैं। वाचकोपमान लुप्तोपमालंकार ॥ ४६३ ॥
सारी डारी नीलकीं, ओट अचूक चुकैंन ।
मो