बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४८ ) सतसई-सटीक ।
भाल लाल बेंदी ललन, आखत रहे विराजि ।
इंदुकला कुजमें बसी, मनौं राहुभयभाजि ॥४४६॥
हे ललन कृष्ण ! वह माथेपर लाल रोलीकी बेंदी लगायेहै,
उसपर चावर लगे हुये ऐसे शोभा देतेहैं कि, मानों चंद्रमाकी
कला मंगलमें आबसी है राहुके डरसे भागकर । उक्तास्पदव-
स्तूतप्रेक्षा ॥ ४४६ ॥
सबै सुहायेही लगैं, बसे सुहाये ठाम ।
गोरे मुँह बेंदी लसै, अरुण पीत सित श्याम॥४४७॥
शोभित ठौरमें बसनेसे सब अच्छे लगते हैं, जैसे गोरे
मुखपर बेंदी शोभा देती है, तथा लाल पीली श्वेत श्याम
यह सब शोभित होते हैं लाल रोली, पीली केशर, श्वेत चंदन-
काली कस्तूरी वा काजरकी बिन्दी। दृष्टान्तालंकार॥४४७॥
तियमुख लगि हीराजरी, बेंदी बढ़ै विनोद ।
सुतसनेह मानौं लिये, विधुपूरण बुध मोद॥४४८॥
प्यारीके मुखपर हीराजरी बेंदी देखकर ऐसी प्रसन्नता
बढती है, मानों पुत्रके स्नेहसे पूर्ण चन्द्रमा बुधको गोदीमें
लिये है किसी पुराणमें भी बुधको श्वेत लिखाहै, तथा
कविप्रियामें नाकके बुलाकके मोतीकी उपमा बुधसे दी है ।
उत्प्रेक्षा ॥४४८ ॥