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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पंचमशतक ५. ( १४९ )
भाल लाल बेंदी दिये, छुटे बार छवि देत ।
गहो राहु अति साहिकर, मनु शशि सूरसमेत ॥
माथेपर लाल बेंदी दियेहै, और छुटे बार ऐसी शोभा देते हैं
मानों चन्द्रमाको सूरज समेत राहुने साहसकर पकड़ा है
यदि कहो निन्दित और पवित्रका संगम कहा तो यों अर्थ
करना कि, माथेपर लाल बेंदी चन्द्रमा सूर्यके समान शोभा
देतीहै वहां राहुभी धीर धारण करगया । उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
मिलि चन्दन बेंदी रही, गोरे मुख न लखाय ।
ज्यों ज्यों मद लाली चढै, त्यों त्यों उघरति जाय॥
चन्दनसे मिलकर गोरे मुखपर लगाई हुई बेंदी देखनेमें
नहीं आती ज्यों ज्यों मुखपर मदकी लाली चढ़तीहै त्यों त्यों
उघड़ती जातीहै । उन्मीलितालंकार ॥ ४६० ॥
सोरठा ।
मंगल बिंव सुरंग, मुख शशि केशर आड गुरु ।
एक नारि लहि संग, रसमय किय लोचन जगत॥