बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १५१ )
रससिंगार मज्जन किये, कंजन भंजन दैन ।
अंजनरंजनहू बिना, खंजन गंजन नैन॥४५५॥
शृंगार रसमें स्नान किये हुए कमलको भी लज्जित करने-
वाले सुरमा लगाये विना भी यह नेत्र भौंलेको लज्जित क-
रते हैं । वृत्यनुप्रास ॥ ४५५ ॥
अरत टरत न वरपरे, दई मरक मनु मैन ।
होड़ाहोड़ी बढ़ चले, चित चतुराई नैन ॥४५६॥
हठ करके टलते नहीं हैं और बढ़पड़े हैं मानों कामदेवने
इनको सनकार दिया है चित्त चतुराई और नेत्र होड़ाहोड़ी
बढ़कर चले हैं । हेतु उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४५६ ॥
योगयुक्ति सिखई सबै, मनो महामुनि मैन ।
चाहत पिय अद्वैतता, कानन सेवत नैन ॥४५७॥
मानों महामुनि कामदेवने इसको सब युक्ति योगकी सि-
खाई है पियासे एकता होनेकी इच्छाकर नेत्र कान अथवा
वनको सेवते हैं, योगका अर्थ परमात्मामें मेल होना और
पतिसे संयोग होना काननका अर्थ वन और कान है योगी
वन और नेत्र कानका सेवन करते हैं। एक देशवर्त्तिसावयव-
रूपक ॥ ४५७ ॥