बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५४ ) सतसई-सटीक ।
नीचेही नीचे निपट, डीठि कुहीलों दौरि ।
उठि ऊँचे नीचे दियो, मन कुलंग झकझोरि ४६५
अति नीचेही नीचे उसकी दृष्टिने कुही ( छोटी बलिष्ठ
चिड़िया ) के समान दौड़ कर देखा और उठ कर मेरे मन-
रूपी कुलंगको ऊंचे नीचे दबोच डाला । दुगोपमा । कुही
चिड़िया कुलंगको भगा देती है ॥ ४६५ ॥
फूले फरकत रैफरी, पल कटाक्ष करवार ।
करत बचावत विय नयन, पावक घाय हजार ४६६
दोना स्त्री पुरुषोंको परस्पर चोट करते देख सखी बोली,
हे सखि ! पलककी ढाल और दृष्टिकी तलवार लेकर प्रसन्न
हो कूदते हैं, और दोनोंकेही नेत्ररूपी पावक हजारों घाव
बचाते हैं। श्लेषगर्भित सविषय सावयवरूपक ॥ ४६६ ॥
तिय कत कमनौंती सिखी, बिन जिह भौंहकमान।
चलचित वेधत चुकत नहिं, बंक विलोकनि बान॥
हे प्रिये ! तुमने यह बाणविद्या कहाँ सीखी है कि, विनाही
रोदा चढ़ाये भौंहरूपी कमानसे बांण छोड चित्तरूपी निशा-
नेको मारती हो तेरे बांके देखनेके बाण चूकतेही नहीं। द्वितीय
विभावना ॥ ४६७ ॥
चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।