बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५० ) सतसई-सटीक।
दोहा।
पँचरँग रंग बेंदी बनी, उठी उमगि मुखज्योति।
पहरे चीर चुनोटिया, चटक चौगुनी होति ४५२॥
पंचरंग बेंदी प्यारीके लगा है, इससे मुखकी ज्योति जगम-
गा उठी है, तथा सुरमई (रक्त और श्याम) वस्त्र पहरे है, इससे
चौगुनी चटक होरही है। अनुगुणालंकार। एक मुखकी कांति
दूजे पियाका रंग पाय खरीहुई. तीजे बेंदी और चीरसे चौगुनी
चटकहै चिनोटिया सुनहरे रुपहरेके तारोंका वस्त्रभी
होता है ॥ ४५२ ॥
खोरि पनच भृकुटी धनुष, बधिक समर तजि कान।
हनत तरुन मृग तिलकशर, सुरख भाल भरि तान।
व्याधे रूप कामदेवने सब मर्य्यादा छोड़कर खौररूप
प्रत्यंचा भृकुटीरूप धनुषसे तिलकरूप बाणमें लालभाल
भरके चढाय युवारूप मृगको मारा ॥ ४५३॥
नासा मोरि नचाय दृग, करी ककाकी सौंह ।
कांटेसी कसकत हिये, गड़ी कटीली भौंह ॥४५४॥
जो कि, उसने नाक सिकोड नयन नचायकर अपने
ककाकी सौगन्ध खाई उस समयकी उसकी कटीली भौंहें मेरे
हृदयमें गड़ी हुई कांटेसी कसकती हैं । स्वभावोक्ति और
पूर्णोपमा ॥ ३५४ ॥