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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पंचमशतक ५. ( १४५ )
और गारीभी अति मीठी लगती हैं, उसका अधिक अनखाना
भी मुसकुराहटके बिना नहीं है। विरोधक्रिया बिन विरोधा-
लंकारवर्णन ॥ ४३६ ॥
लहि रतिसुख लगिये गरे, लखी लजीली डीठि
खुलत न मो मनगडिरही, वहैअधखुलीनीठि ४३७
नायकवचन, हेसखि ! जिस समय वह रतिका सुख लेकर
गलेसे लगी, और लाजभरी दृष्टिसे देखा, सो वह उसकी अ-
धखुली दृष्टि छुटती नहीं, मेरे मनमें गडरहीहै। विरोधाभास !
[ दो०-जो विरोधवत भासियत, अरु विरुद्ध नहिं होयकहत
विरोधाभास तेहि, कविजन जानत कोय] ॥ ४३७॥
बडी कुटुमकी भीरमें, रही पैठ दे पीठि।
तऊ पलक परिजात इत, हेरि हँसौही डीठि ४३८
कुटुम्बके लोगोंकी बड़ी भीरमें यद्यपि वह पीठ देकर बैठ
गई है तथापि स्वभावसे हँसीली दृष्टिसे इधर पलक पड़जातीहै
और देखतीहै । तृतीय विभावना ॥ ४३८ ॥
सरसत पोंछति लखिरहत, लागि कपोलकें ध्यान ।
करिलेप्यो पाटल विमल, प्यारी पठये पान४३९
कहीं प्यारीके भेजे पान प्यारेके पास आये उन्हें देखकर
कपोलोंका ध्यान आगया, इसपर सखी कहनेलगी दूतीहें