बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४४ ) सतसई-सटीक ।
मरवेको साहस कियो, बढे विरहकी पीर ।
दौरति है समुहे शशिहि, सरसिज सुरभिसमीर ॥
विरहकी पीर बढजानेसे वियोगिनीने मरनेका साहस
किया है, चन्द्रमा कमल सुगन्धित पवन इनके सन्मुख दौ-
रती है तात्पर्य यह कि, वियोगीको उपरोक्त वस्तु ताप देती
है सो वह इनके समीप धावमान होती है कि, अधिक अग्निसे
शरीर भस्म होजाय, यहाँ चन्द्रमादि उद्दीपन विभाव हैं,
विचित्रांलंकार [ दोहा-जहँ निज इच्छा किये ते फल विपरीत
लखाय । तेहि विचित्र भूषण कहत, कविजन हिय
हुलसाय ] ॥ ४३४ ॥
सुनतपथिकमुहँमाहानिशि, लुएँचलत उहिगाम ।
बिन बूझे बिनहू कहे, जियत विचारी वाम॥४३५॥
पथिकके मुखसे यह बात सुनकर कि, माहकी रातमें
उस गाममें लुएँ चलती हैं, बिना बूझे बिनाही कहे प्रोषित
पतिका बालाके नायकने विचारलिया कि, प्यारी अबतक
जीतीहै चलें । अनुमान ॥ ४३५ ॥
मानों मनुहारी भरी, मान्यो खरी मिठाहिं ।
वाको अति अनखाहटो, मुसकाहट बिन नाहिं ॥
धृष्टनायककथन, सखी मारभी उसकी प्यारसे भरी ह