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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 199

( १४६ ) सतसई-सटीक ।
पोंछते हैं देखते रहजातेहैं प्यारीके गालोंके ध्यानमें लगेहुए
गुलाबसे निर्मल हाथमें प्यारीके भेजे पान लेकर सरसते हैं
पाटल-कुछ सफेदी और लाली लिये गुलाब । सरसतका अर्थ
चिकनानेका है ॥ ४३९ ॥
नखशिखवर्णन ।
सहज सुचिक्कन स्याम रुचि,शुचिसुगंधसुकुमार।
गनत न मनपथअपथलखि,बिथुरेसुथरेबार ४४०.
स्वभावसे चिकने, कारे कान्तिमान्, पवित्र, सुगंधित और
कोमल बिखरे सुन्दर बार उसके देखकर मेरा मन पथ अपथ
भला बुरा नहीं विचारता । जाति अलंकार [दोहा-निजजाति
नके कर्म गुण, जामें मिलहिं प्रवीन ॥ ताहि जातिभूषण
कहत, यह मत अतिप्राचीन ] ॥ ४४० ॥
छुटे छुटावैं जगतसे, सटकारे सुकुमार ।
मन बाँधत वेणी बँधे, नीलछबीरे बार ॥ ४४१ ॥
प्यारीके बाल छुटे ( खुले ) हुए जगत्से छुटादेतेहैं, इस
प्रकार सटकारे( लम्बे पतले ) और कोमल हैं और वेणी बाँ-
धनेसे मनको बांधते हैं इस प्रकार नीले छबिभरे बारहैं । चतुर्थ
विभावना ॥ ४४१ ॥
कुटिलअलकछुटिपरतमुख,बढिगोइतो उदोत ।
बँक बँकारी देत ज्यों, दाम रुपैया होत ॥४४२॥