बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
( १३८ ) सतसई-सटीक ।
भ्रुकुटी मटकन पीतपट, चटक लटकती चाल ।
चलचखचितवनि चोरि चित, लियो विहारीलाल॥
हे सखि ! भौंहोंके मटकाने, पीतवस्त्रकी चटक, लटकती
चाल तथा चंचल आंखोंकी चितवनसे कृष्णने मेरा मन
चुरालिया । जाति अलंकार ॥ ४१४ ॥
औरै भाँति भये बये, चौसर चंदन चंद ।
पतिबिन अतिपारति विपति, मारत मारुत मंद ॥
हे सखी! अब चार लडका मोतियोंके फूलोंका हार चंदन
और चन्द्रमा अब औरही भांतिके होगये यह पतिके विना
महाविपत्ति डालते हैं और मंद पवन तो मारे डालती है ।
भेदाकातिशयोक्ति ॥ ४१५ ॥
हौँही बौरी विरहवश, कै बोरो सब गाम ।
कहाजानिये कहतहैं, शशिहि शीतकरनाम ४१६
हे सखी ! क्या विरहके वंशसे मैं बौरीगईहूं, कै सब गांव बा-
वरोहै क्या जानकर चन्द्रमाका नाम शीतल किरण कहते हैं.
यह तो शीतकर नहीं है । संदेहालंकार ॥ ४१६ ॥
ह्यांते हां ह्यांते यहां, नैको धरत न धीर ।
निशिदिन ठाढीसीरहै, बाढी गाढी पीर ॥४१७॥
हे सखी ! वह ह्यांसे हां और हांसे यहां आतीहै, तनकभी
पंचमशतक ५. ( १३९ )
धीर धारण नहीं करती रातदिन जलीसी रहती है उसको
गाढ़ी पीर बढ़ीहै । वृत्यनुप्रास ॥ ४१७ ॥
इत आवत चलिजात उत, चली छ सातिक हाथ।
चढ़ी हिंडोरेसीरहै, लगी उसासनि साथ ॥४१८॥
इधर आवैहै, उधर चलीजायहै, फिर छः सातक हाथ
चलती है उसासोंके साथ लगी हिंडोरे पर चढ़ीसी रहती है
आशय यह कि, सांस छोडनेसे बढ़ै है और लेनेसे हटैहै।
उपमेयलुप्ता ॥ ४१८ ॥
फिरि फिरि बूझति कहि कहा, कहो साँवरे गात ।
कहा करत देखे कहां, अली चली क्यों बात४१९
प्रेमके मारे सखीसे वारंवार बूझती है कह तो साँवरे शरी-
रने क्या कहाहै, कृष्ण तुमने क्या करते हुए कहां देखे, और
उनके समीप मेरी चर्चा कैसे चली। प्रेमालंकार ॥ ४१९ ॥
जोन्ह नहीं यह तम यहै, किये जु जगत निकेत ।
होतउदयशशिकं भयो, मानहु शशिडरिसित४२०
हे सखी ! यह चांदनी नहीं वही अंधकार है जिसने जगत
में अपने घर कियेथे चन्द्रमाके उदय होतेही मानों सहमकर
धोला होगया है । उत्प्रेक्षा- चांदनी सुखदाई होती है यह
दुःखदहै प्रोषितपतिका० ॥४२०॥
( १४० ) सतसई-सटीक ।
तजि शंका सकुचत न चित, बोलत बाक कुबाक।
दिनक्षणदा छाकीरहति, छुटति नक्षणछबिछाक॥
प्रोषितपतिका क प्रलाप उन्माद वर्णन, सखी उसने शंका
त्याग दी है चित्तमें सकुचाती नहीं वाक्य कुवाक्य बोलती है
दिन रात मत्त रहती है क्षणको प्रीतमके रूपका मद नहीं
छुटता [ दोहा-दोमें हो इक अधिकई, व्यतिरेकालंकार ।
मदछक पुनि छबि छकरही, छुटत न प्राण अधार ] । व्यति-
रेकालंकार ॥ ४२१ ॥
करके मीडे कुसुमलों, गई विरह कुम्हिलाय ।
सदासमीपिनसखिनहूं, नीठ पिछानी जाय ४२२
प्रोषितपतिकाको सखीका वचन, तुम्हारी प्यारी हाथके
मसले फूलके समान कुम्हिला गई है सदा समीपमें रहने-
वाली सखियोंसेभी तो नहीं पहँचानी जाती। लुप्तालंकार ४२२
नेक न जानी परत यों, परो विरहू तनु छाम ।
उठति दियालों बाढ़िहरि, लियो तिहारेनाम४२३
वह इस समय नेक भी नहीं जानी पडती इस प्रकार
विरहसे उसका शरीर क्षीण पडगया है परन्तु हेकृष्ण! तुम्हा-
रा नाम लेनेसे अब भी दीवेके समान डहडहा उठती है। उप-
मेयलुप्ता है ॥ ४२३ ॥
पंचमशतक ५. ( १४१ )
करी विरह ऐसी तऊ, गैल न छांडत नीच।
दीन्हेहू चश्माचखन, चाहै लखै न मीच॥४२४॥
यद्यपि वियोगने ऐसा 'दुर्बल' कररक्खाहै तथापि नीच
मार्ग नहीं छोड़ती मृत्यु आँखोंमें चश्मा लगाकर भी ढूंढती
है परन्तु उसे नहीं पाती इससे बची है ऐसी दुबली होगई
है। अत्युक्ति ॥ ४२४ ॥
नित संशो हंसो बचत, मनो सुइह अनुमान।
विरह अगिन लपटिनसकै, झपटनमीच सिचान॥
हे सखी! यह सदा 'संशो' संदेहही रहता है कि, इसका
(हंसो) जीव कैसे बचेगा, परन्तु यह अनुमान है कि, विरहकी
अग्निकी लपटोंसे बाजरूपी मृत्यु इसको झपट नहीं सकती
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४२५ ॥
पलन प्रगट बरुनीन बढ़ि, छन कपोल ठहरात।
अँसुआपरछतियांछिनक, छनछनायछिपछात॥
हे सखी ! पलकोंमें प्रगटहो बरौनियों में बढ़कर क्षणमा-
त्रको कपोलपर ठहरते हैं, फिर उसके आंसु छातीपर पड़ते
ही छिनमात्रमें छनछना कर छिप जाते हैं। अत्युक्ति॥४२६॥
प्रगट्यो आग वियोगकी, बह्यो विलोचन नीर।
आठों याम रहे हियो, उठ्यो उमंगसमीर॥४२७॥
( १४२ ) सतसई-सटीक ।
वियोगकी आगसे प्रगट हुआ जल उसके नेत्रों से बहता
है आठों पहर उसका मन इवासकी पवनसे उड़ा रहता है ।
पर्यायोक्ति ॥ ४२७ ॥
तजो आँच अति विरहकी,रह्यो प्रेमरस भीज ।
नयननिके मग जल बहै,हियो पसीज पसीज ४२८
हे सखी ! अब इसका शरीर विरहकी आंचसे तचा है और
प्रेमके रसमें भीजकर हृदयसे पसीज २ कर नेत्रोंके मार्ग से
जल बहता है । समासोक्ति ॥ ४२८ ॥
चकी जकीसी है रही, बूझे बोलति नीठि ।
कहूं दीठलोनी लगी, कै काहूकी दीठि ॥४२९॥
जड़ता वर्णन, वह भौंचक जकड़ीसी होरही है, बूझेसे
भी नहीं बोलती, नीठकर कहीं इसकी दृष्टि लगी है, अथवा
किसीकी दृष्टि इसे लगी है। सन्देहालंकार ॥ ४२९ ॥
मरी डरी कि टरी व्यथा,कहा खरी चलि चाहि !
रहीकराहि कराहि अति,अबमुख आहि नआहि ॥
मरी पड़ी है अथवा उसकी व्यथा दूर हुई, तू क्या खड़ी
ह चलकर देख तौ कराह कराह रही थी अब बहुत इसके
मुखमें हाय नहीं है मरणदशा । वृत्यनुप्रासकी भांति वीप्सा
और यमक ॥ ४३० ॥
पंचमशतक ५. (१४३)
गनती गनवेते रही, छतहू अछत समान ।
अब अलिये तिथि औमलो, परे रहैं तनुप्रान४३१
जिस प्रकारसे अवम् तिथि गिन्तीके गिननेमें नहीं आती
है और वह ( छत ) होकरभी अनहोनेके समान है, हे
आली ! अब यह औम् हानि तिथिके समान शरीरमें प्राण
पडे रहेंगे काममें नहीं आवेंगे । पूर्णोपमा ॥ ४३१ ॥
विरहविपति दिन परतही, तजे सुखनि सब अंग ।
रहि अवलम्ब दुखी भये, चला चली जियसंग ॥
हे सखी ! विरहकी विपत्तिके दिन पडतेही सुखोंने सब
अंगोंको त्याग दिया, अबलों दुःखोंका अवलम्ब था परन्तु
अब जीके साथ वेभी जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ४३२ ॥
मरुन भलो वरु विरहते, यह विचार चित जोय ।
मरत मिटै दुख एकको, विरह दुहुँन दुख होय ४३३
हे सखि ! वियोगसे मरना भला है, यह विचार तू अपने
मनमें कर देख, कारण कि, मरनेमें एकका दुःख छूट जाता
है, और विरहमें दोनोंको दुःख होता है । लेशालंकार [दोहा-
दोषनमें गुण कल्पना, गुणमें दोष बनाय ॥ सो लेशालंकार
है कविजन लखन सुभाय ] ॥ ४३३ ॥
( १४४ ) सतसई-सटीक ।
मरवेको साहस कियो, बढे विरहकी पीर ।
दौरति है समुहे शशिहि, सरसिज सुरभिसमीर ॥
विरहकी पीर बढजानेसे वियोगिनीने मरनेका साहस
किया है, चन्द्रमा कमल सुगन्धित पवन इनके सन्मुख दौ-
रती है तात्पर्य यह कि, वियोगीको उपरोक्त वस्तु ताप देती
है सो वह इनके समीप धावमान होती है कि, अधिक अग्निसे
शरीर भस्म होजाय, यहाँ चन्द्रमादि उद्दीपन विभाव हैं,
विचित्रांलंकार [ दोहा-जहँ निज इच्छा किये ते फल विपरीत
लखाय । तेहि विचित्र भूषण कहत, कविजन हिय
हुलसाय ] ॥ ४३४ ॥
सुनतपथिकमुहँमाहानिशि, लुएँचलत उहिगाम ।
बिन बूझे बिनहू कहे, जियत विचारी वाम॥४३५॥
पथिकके मुखसे यह बात सुनकर कि, माहकी रातमें
उस गाममें लुएँ चलती हैं, बिना बूझे बिनाही कहे प्रोषित
पतिका बालाके नायकने विचारलिया कि, प्यारी अबतक
जीतीहै चलें । अनुमान ॥ ४३५ ॥
मानों मनुहारी भरी, मान्यो खरी मिठाहिं ।
वाको अति अनखाहटो, मुसकाहट बिन नाहिं ॥
धृष्टनायककथन, सखी मारभी उसकी प्यारसे भरी ह
पंचमशतक ५. ( १४५ )
और गारीभी अति मीठी लगती हैं, उसका अधिक अनखाना
भी मुसकुराहटके बिना नहीं है। विरोधक्रिया बिन विरोधा-
लंकारवर्णन ॥ ४३६ ॥
लहि रतिसुख लगिये गरे, लखी लजीली डीठि
खुलत न मो मनगडिरही, वहैअधखुलीनीठि ४३७
नायकवचन, हेसखि ! जिस समय वह रतिका सुख लेकर
गलेसे लगी, और लाजभरी दृष्टिसे देखा, सो वह उसकी अ-
धखुली दृष्टि छुटती नहीं, मेरे मनमें गडरहीहै। विरोधाभास !
[ दो०-जो विरोधवत भासियत, अरु विरुद्ध नहिं होयकहत
विरोधाभास तेहि, कविजन जानत कोय] ॥ ४३७॥
बडी कुटुमकी भीरमें, रही पैठ दे पीठि।
तऊ पलक परिजात इत, हेरि हँसौही डीठि ४३८
कुटुम्बके लोगोंकी बड़ी भीरमें यद्यपि वह पीठ देकर बैठ
गई है तथापि स्वभावसे हँसीली दृष्टिसे इधर पलक पड़जातीहै
और देखतीहै । तृतीय विभावना ॥ ४३८ ॥
सरसत पोंछति लखिरहत, लागि कपोलकें ध्यान ।
करिलेप्यो पाटल विमल, प्यारी पठये पान४३९
कहीं प्यारीके भेजे पान प्यारेके पास आये उन्हें देखकर
कपोलोंका ध्यान आगया, इसपर सखी कहनेलगी दूतीहें
( १४६ ) सतसई-सटीक ।
पोंछते हैं देखते रहजातेहैं प्यारीके गालोंके ध्यानमें लगेहुए
गुलाबसे निर्मल हाथमें प्यारीके भेजे पान लेकर सरसते हैं
पाटल-कुछ सफेदी और लाली लिये गुलाब । सरसतका अर्थ
चिकनानेका है ॥ ४३९ ॥
नखशिखवर्णन ।
सहज सुचिक्कन स्याम रुचि,शुचिसुगंधसुकुमार।
गनत न मनपथअपथलखि,बिथुरेसुथरेबार ४४०.
स्वभावसे चिकने, कारे कान्तिमान्, पवित्र, सुगंधित और
कोमल बिखरे सुन्दर बार उसके देखकर मेरा मन पथ अपथ
भला बुरा नहीं विचारता । जाति अलंकार [दोहा-निजजाति
नके कर्म गुण, जामें मिलहिं प्रवीन ॥ ताहि जातिभूषण
कहत, यह मत अतिप्राचीन ] ॥ ४४० ॥
छुटे छुटावैं जगतसे, सटकारे सुकुमार ।
मन बाँधत वेणी बँधे, नीलछबीरे बार ॥ ४४१ ॥
प्यारीके बाल छुटे ( खुले ) हुए जगत्से छुटादेतेहैं, इस
प्रकार सटकारे( लम्बे पतले ) और कोमल हैं और वेणी बाँ-
धनेसे मनको बांधते हैं इस प्रकार नीले छबिभरे बारहैं । चतुर्थ
विभावना ॥ ४४१ ॥
कुटिलअलकछुटिपरतमुख,बढिगोइतो उदोत ।
बँक बँकारी देत ज्यों, दाम रुपैया होत ॥४४२॥
पंचमशतक ५. (१४७)
टेढ़ी अलकें छूटकर पड़तेही मुखकी इतनी ज्योति बढ़
गई जैसे टेढ़ी लकीर देनेसे दामका रुपैया होजाताहै। पूर्णो-
पमा ॥ ४४२ ॥
कच समेट कर भुज उलटि,खरा शीशपट टारि ।
काको मन बाँधे न यह,जूरी बाँधनिहारि ॥४४३॥
बाल समेट कर भुजा उलटकर (पीछे करके) तथा शिर
का कपड़ा हटाकर यह जूड़ाबाँधनेवारी किसका मन नहीं
बाँधती। जातिअलंकार ॥ ४४३ ॥
नीको लसत ललाटपर, टीको जरित जराय ।
छबिहि बढ़ावत रवि मनौं, शशिमंडलमें आय ॥
टीका वर्णन, जडाऊजडित टीका माथे पर बहुत अच्छा
लगता है मानों सूर्य चंद्रमण्डलमें आकर छविको बढ़ाताहै।
उक्तारूपदोत्प्रेक्षा ॥ ४४४ ॥
कहत सब बेंदी दिये, आंक दशगुणो होत ।
तिय लिलार बेंदी दिये, अगणित बढ़त उदोत ॥४४५॥
यह सब कहतेहैं कि बिन्दी देनेसे अंक दशगुणा होजाताहै,
परन्तु प्यारीके माथेपर बेंदी लगानेसे अगणित कांति
बढ़ती है। व्यतिरेकालंकार ॥ ४४५ ॥
( १४८ ) सतसई-सटीक ।
भाल लाल बेंदी ललन, आखत रहे विराजि ।
इंदुकला कुजमें बसी, मनौं राहुभयभाजि ॥४४६॥
हे ललन कृष्ण ! वह माथेपर लाल रोलीकी बेंदी लगायेहै,
उसपर चावर लगे हुये ऐसे शोभा देतेहैं कि, मानों चंद्रमाकी
कला मंगलमें आबसी है राहुके डरसे भागकर । उक्तास्पदव-
स्तूतप्रेक्षा ॥ ४४६ ॥
सबै सुहायेही लगैं, बसे सुहाये ठाम ।
गोरे मुँह बेंदी लसै, अरुण पीत सित श्याम॥४४७॥
शोभित ठौरमें बसनेसे सब अच्छे लगते हैं, जैसे गोरे
मुखपर बेंदी शोभा देती है, तथा लाल पीली श्वेत श्याम
यह सब शोभित होते हैं लाल रोली, पीली केशर, श्वेत चंदन-
काली कस्तूरी वा काजरकी बिन्दी। दृष्टान्तालंकार॥४४७॥
तियमुख लगि हीराजरी, बेंदी बढ़ै विनोद ।
सुतसनेह मानौं लिये, विधुपूरण बुध मोद॥४४८॥
प्यारीके मुखपर हीराजरी बेंदी देखकर ऐसी प्रसन्नता
बढती है, मानों पुत्रके स्नेहसे पूर्ण चन्द्रमा बुधको गोदीमें
लिये है किसी पुराणमें भी बुधको श्वेत लिखाहै, तथा
कविप्रियामें नाकके बुलाकके मोतीकी उपमा बुधसे दी है ।
उत्प्रेक्षा ॥४४८ ॥
पंचमशतक ५. ( १४९ )
भाल लाल बेंदी दिये, छुटे बार छवि देत ।
गहो राहु अति साहिकर, मनु शशि सूरसमेत ॥
माथेपर लाल बेंदी दियेहै, और छुटे बार ऐसी शोभा देते हैं
मानों चन्द्रमाको सूरज समेत राहुने साहसकर पकड़ा है
यदि कहो निन्दित और पवित्रका संगम कहा तो यों अर्थ
करना कि, माथेपर लाल बेंदी चन्द्रमा सूर्यके समान शोभा
देतीहै वहां राहुभी धीर धारण करगया । उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
मिलि चन्दन बेंदी रही, गोरे मुख न लखाय ।
ज्यों ज्यों मद लाली चढै, त्यों त्यों उघरति जाय॥
चन्दनसे मिलकर गोरे मुखपर लगाई हुई बेंदी देखनेमें
नहीं आती ज्यों ज्यों मुखपर मदकी लाली चढ़तीहै त्यों त्यों
उघड़ती जातीहै । उन्मीलितालंकार ॥ ४६० ॥
सोरठा ।
मंगल बिंव सुरंग, मुख शशि केशर आड गुरु ।
एक नारि लहि संग, रसमय किय लोचन जगत॥
( १५० ) सतसई-सटीक।
दोहा।
पँचरँग रंग बेंदी बनी, उठी उमगि मुखज्योति।
पहरे चीर चुनोटिया, चटक चौगुनी होति ४५२॥
पंचरंग बेंदी प्यारीके लगा है, इससे मुखकी ज्योति जगम-
गा उठी है, तथा सुरमई (रक्त और श्याम) वस्त्र पहरे है, इससे
चौगुनी चटक होरही है। अनुगुणालंकार। एक मुखकी कांति
दूजे पियाका रंग पाय खरीहुई. तीजे बेंदी और चीरसे चौगुनी
चटकहै चिनोटिया सुनहरे रुपहरेके तारोंका वस्त्रभी
होता है ॥ ४५२ ॥
खोरि पनच भृकुटी धनुष, बधिक समर तजि कान।
हनत तरुन मृग तिलकशर, सुरख भाल भरि तान।
व्याधे रूप कामदेवने सब मर्य्यादा छोड़कर खौररूप
प्रत्यंचा भृकुटीरूप धनुषसे तिलकरूप बाणमें लालभाल
भरके चढाय युवारूप मृगको मारा ॥ ४५३॥
नासा मोरि नचाय दृग, करी ककाकी सौंह ।
कांटेसी कसकत हिये, गड़ी कटीली भौंह ॥४५४॥
जो कि, उसने नाक सिकोड नयन नचायकर अपने
ककाकी सौगन्ध खाई उस समयकी उसकी कटीली भौंहें मेरे
हृदयमें गड़ी हुई कांटेसी कसकती हैं । स्वभावोक्ति और
पूर्णोपमा ॥ ३५४ ॥
पंचमशतक ५. ( १५१ )
रससिंगार मज्जन किये, कंजन भंजन दैन ।
अंजनरंजनहू बिना, खंजन गंजन नैन॥४५५॥
शृंगार रसमें स्नान किये हुए कमलको भी लज्जित करने-
वाले सुरमा लगाये विना भी यह नेत्र भौंलेको लज्जित क-
रते हैं । वृत्यनुप्रास ॥ ४५५ ॥
अरत टरत न वरपरे, दई मरक मनु मैन ।
होड़ाहोड़ी बढ़ चले, चित चतुराई नैन ॥४५६॥
हठ करके टलते नहीं हैं और बढ़पड़े हैं मानों कामदेवने
इनको सनकार दिया है चित्त चतुराई और नेत्र होड़ाहोड़ी
बढ़कर चले हैं । हेतु उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४५६ ॥
योगयुक्ति सिखई सबै, मनो महामुनि मैन ।
चाहत पिय अद्वैतता, कानन सेवत नैन ॥४५७॥
मानों महामुनि कामदेवने इसको सब युक्ति योगकी सि-
खाई है पियासे एकता होनेकी इच्छाकर नेत्र कान अथवा
वनको सेवते हैं, योगका अर्थ परमात्मामें मेल होना और
पतिसे संयोग होना काननका अर्थ वन और कान है योगी
वन और नेत्र कानका सेवन करते हैं। एक देशवर्त्तिसावयव-
रूपक ॥ ४५७ ॥
( १५२ ) सतसई-सटीक ।
खेलन सिखये अलि भले, चतुर अहेरी मार ।
काननचारी नैन मृग, नागरनरन शिकार ४५८॥
हे सखी चतुरशि कारी कामदेवने कानन(वन और कान)
तकजानेवाले नेत्ररूपी मृग चतुर मनुष्योंके शिकार करनेवाले
अच्छे खिलाडी सिखाये हैं। अद्भुतरस रूपकालंकार,मृग मनु-
ष्योंका शिकार करते हैं यह अद्भुत है ॥ ४५८ ॥
सायकसम घायक नयन, रँगे त्रिविध रंग गात ।
झखौ बिलखि दुरिजात जल, लखिजलजात लजात
बाणोंके समान घायल करनेवाले नेत्र श्वेत श्याम रक्त तीन
प्रकारके रंगसे रँगे हैं जिनको देखकर मछली जलमें छिप जाती
और दीर्घता देखकर कमल लजाते हैं। हेतु उत्प्रेक्षा ॥४५९॥
बर जीते शर मैनके, ऐसे देखे मैन ।
हरनीके नैनानते, हर नीके यह नैन ॥ ४६० ॥
हेहरिकृष्ण! इन्होंने बलसे कामके बाण जीतलिये ऐसा मैंने
देखा यह नेत्र तो हरनीके नेत्रोंसे भी नीके अच्छे हैं चंचलता।
काव्यलिंग और यमक ॥ ४६० ॥
झूँठे जान न संग्रहै, मन मुख निकसे वैन ।
याहीते मानहु किये, बातनको विधि नैन४६१॥
पंचमशतक ५. ( १५३ )
दोनोंका मन मुँहसे निकले वचनोंको झूठे जान कर संग्रह
नहीं करता, इसीसे मानों ब्रह्माने बातें करनेको नेत्र
बनाये हैं । सिद्धास्पदहेतूत्प्रेक्षा ॥ ४६१ ॥
दृगनि लगत वेधत हियो, विकल करत अँग आन।
यह तेरे सवसे विषम, ईछन तीछन वान ४६२॥
आँखों में लगते हैं और हृदयको वेधते हैं आनही सब
अंगोंको विकल करदेते हैं तेरे यह नेत्ररूपी पैन तीर सवसे
कठिन (विषम) हैं । असंगति ॥ ४६२ ॥
फिरि फिरि दौरत देखियत, निचले नेक रहैंन ।
ए कजरारे कौन पर,करत कजाकी नैन॥४६३॥
यह वार वार दौड़ते देखे जाते हैं क्षणमात्रको भी नि-
चले नहीं रहते यह काजर विना दियेही काजर दियेसे किस
पर दौड़ करते हैं। वाचकोपमान लुप्तोपमालंकार ॥ ४६३ ॥
सारी डारी नीलकीं, ओट अचूक चुकैंन ।
मो
( १५४ ) सतसई-सटीक ।
नीचेही नीचे निपट, डीठि कुहीलों दौरि ।
उठि ऊँचे नीचे दियो, मन कुलंग झकझोरि ४६५
अति नीचेही नीचे उसकी दृष्टिने कुही ( छोटी बलिष्ठ
चिड़िया ) के समान दौड़ कर देखा और उठ कर मेरे मन-
रूपी कुलंगको ऊंचे नीचे दबोच डाला । दुगोपमा । कुही
चिड़िया कुलंगको भगा देती है ॥ ४६५ ॥
फूले फरकत रैफरी, पल कटाक्ष करवार ।
करत बचावत विय नयन, पावक घाय हजार ४६६
दोना स्त्री पुरुषोंको परस्पर चोट करते देख सखी बोली,
हे सखि ! पलककी ढाल और दृष्टिकी तलवार लेकर प्रसन्न
हो कूदते हैं, और दोनोंकेही नेत्ररूपी पावक हजारों घाव
बचाते हैं। श्लेषगर्भित सविषय सावयवरूपक ॥ ४६६ ॥
तिय कत कमनौंती सिखी, बिन जिह भौंहकमान।
चलचित वेधत चुकत नहिं, बंक विलोकनि बान॥
हे प्रिये ! तुमने यह बाणविद्या कहाँ सीखी है कि, विनाही
रोदा चढ़ाये भौंहरूपी कमानसे बांण छोड चित्तरूपी निशा-
नेको मारती हो तेरे बांके देखनेके बाण चूकतेही नहीं। द्वितीय
विभावना ॥ ४६७ ॥
चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।
पंचमशतक ५. (१७५)
मानहुँ सुरसरिता विमल, जल उछरत युग मीन॥
झीने घूँघटके वस्त्रमें चञ्चल नेत्र चमचमाते हैं मानों
गंगाजीके उज्ज्वल जलमें दो मछली उछलती हैं। वस्तु उत्प्रे-
क्षा। वस्त्र श्वेत ॥ ४६८ ॥
वारों बलि तो दृगनिपर, अलि खंजन मृगमीन ।
आधी दीठि चितौन जेहि, किये लाल आधीन ॥
तेरे इन नेत्रोंपर मैं भौंरे ममोले मृग और मीनको भी वार-
डारूं जो तैंने आधी दृष्टिसे देखतेही कृष्णको अपने आधीन
करलिया । व्यतिरेकालंकार ॥ ४६९ ॥
जे तब हुती दिखादिखी, भई अमी दृक अंक ।
दगै तिरीछी दीठि अब, ह्वै बीछीको डंक ॥४७०॥
जो तब देखा देखी थी वह निश्चयही अमृतरूप हुई थी
अब तो वह तिरछी दृष्टि बिच्छूका डंक होकर दागती (डस-
ती) है । पर्याय अलंकार ॥ ४७० ॥
बेधक अनियारे नयन, बेधत करत निषेध ।
बरबस बेधत मो हियो, नौ नासाको बेध ॥४७१॥
यह तेरे तीक्ष्ण नेत्र बेध डालने में इन्हें रोकनेका निषेध न
कर तेरी नासाका बेधही बरबस मेरा मन बेध डालता है ।
चतुर्थ विभावना ॥ ४७१ ॥
( १५६ ) सतसई-सटीक ।
जटित नीलमणि जगमगत, सींक सुहाई नाक ।
मनो अली चम्पककली, बसि रस लेत निशंक ।
नीलमणिकी जड़ी हुई झलकी नाकपर शोभा देती है
मानों भौंरा चम्पेकी कलीमें निवास कर रस लेता है। वस्तु-
उत्प्रेक्षालंकार ॥ ४७२ ॥
यदपि लौंग ललितौ तऊ, पहिर न तू इक आँक।
सदा शंक बढिये रहै, यहै चढेसी नाक ॥ ४७३ ॥
यद्यपि लौंग सुन्दर है, तो भी तू मत पहरे, इसमें निश्चय
मान यह तेरी चढीसी नाक देखकर सदा शंका बढतीही
रहती है अर्थात् नाक चढनेसे मानका भ्रम होता है। व्याज-
स्तुति ॥ ४७३ ॥
इन दोई मोती सुगथ, तू नथ गरब निशांक ।
जिह पहरत जग दृग ग्रसत, लसत हंसत सीनाँक॥
इन दोई मोतीके अच्छेप्रकारसे गुथनेसे हे नथ! तू निःशंक
गर्वकर, जिसके पहरनेसे जगत्के नेत्र ग्रसकर नासिका हँसती-
सी विदित होतीहै ! काव्यलिंग ॥४७४॥
बेसरमोती धनि तुही, को पूछै कुल जाति ।
पीबोकर तियओठको, रसनिधरक दिनराति४७५
पंचमशतक ५. ( १५७ )
हे बेसरके मोती ! तू ही धन्यहै ऐसे विषयमें कोई कुल
जाति नहीं पूछता तू। प्यारीके ओठका रस रातदिन पीता रह।
अन्योक्ति ॥ ४७५ ॥
वरन वास सुकुमारता, सबविधि रही समाय ।
पँखुरी लगे गुलाबकी, गात न जानी जाय ४७६॥
वरन ( रंग ) सुगंधि सुकुमारता सब प्रकार उसमें समा-
रहीहै जो गुलाबकी पंखुरी भी शरीरसे लगी हुई नहीं जानी
जाती गुलाब और शरीरका रंग एकसाहै ॥ ४७६ ॥
लौने मुख दीठि न लगै, यों कहि दीनों ईठि ।
दूनी ह्वै लागन लगी, दिये डिठौना दीठि ४७७॥
इस सलोने मुखपर किसीकी नजर न लगे यों कह सखी-
ने स्याही की बिन्दी लगादी, दीठ डिठौनाके लगातेही दूनी
हो लगने लगी । विषमालंकार ॥ ४७७ ॥
पिय तियसों हँसिकै कह्यो, लखि डिठौना दीन ।
चन्द्रमुखी मुखचंद्र तें, भलो चन्द्रसम कीन ४७८
प्यारीको डिठौना स्याहीकी बिन्दी लगाये देख पियाने
तियासे हँसकर कहा, हेचन्द्रवदनि ! तुमने अपना मुखचंद्र
अच्छा चन्द्रमाके समान किया अर्थात प्रथम निर्मल चन्द्र-