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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

( १३८ ) सतसई-सटीक ।
भ्रुकुटी मटकन पीतपट, चटक लटकती चाल ।
चलचखचितवनि चोरि चित, लियो विहारीलाल॥
हे सखि ! भौंहोंके मटकाने, पीतवस्त्रकी चटक, लटकती
चाल तथा चंचल आंखोंकी चितवनसे कृष्णने मेरा मन
चुरालिया । जाति अलंकार ॥ ४१४ ॥
औरै भाँति भये बये, चौसर चंदन चंद ।
पतिबिन अतिपारति विपति, मारत मारुत मंद ॥
हे सखी! अब चार लडका मोतियोंके फूलोंका हार चंदन
और चन्द्रमा अब औरही भांतिके होगये यह पतिके विना
महाविपत्ति डालते हैं और मंद पवन तो मारे डालती है ।
भेदाकातिशयोक्ति ॥ ४१५ ॥
हौँही बौरी विरहवश, कै बोरो सब गाम ।
कहाजानिये कहतहैं, शशिहि शीतकरनाम ४१६
हे सखी ! क्या विरहके वंशसे मैं बौरीगईहूं, कै सब गांव बा-
वरोहै क्या जानकर चन्द्रमाका नाम शीतल किरण कहते हैं.
यह तो शीतकर नहीं है । संदेहालंकार ॥ ४१६ ॥
ह्यांते हां ह्यांते यहां, नैको धरत न धीर ।
निशिदिन ठाढीसीरहै, बाढी गाढी पीर ॥४१७॥
हे सखी ! वह ह्यांसे हां और हांसे यहां आतीहै, तनकभी